एम्स गोरखपुर। जागरण
दुर्गेश त्रिपाठी, गोरखपुर। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में एस्परजिलोसिस (फंगल संक्रमण) बढ़ रहा है। एम्स गोरखपुर के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग में पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी उत्तरी बिहार के पांच सौ रोगियों पर एक वर्ष तक चले अध्ययन में साफ हुआ है कि इस घातक रोग के 50 प्रतिशत से ज्यादा रोगी टीबी की दवा खा रहे हैं।
इसकी वजह से रोगियों का मर्ज और बढ़ता जा रहा है। फेफड़े में संक्रमण की वजह से होने वाला यह रोग उन लोगों को ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है, जिनकी कीमोथेरेपी चल रही है या जिन्होंने अंग प्रत्यारोपण कराया है। अस्थमा, सिस्टिक फाइब्रोसिस, टीबी और स्टेरायड लेने वाले लोगों में भी यह रोग ज्यादा हो रहा है।
एस्परगिलोसिस और टीबी के लक्षण एक जैसे ही होते हैं। आमतौर पर एस्परजिलोसिस उन रोगियों को ज्यादा होता है, जिन्हें टीबी हो चुकी है। दवाओं से टीबी खत्म होने के बाद भी फेफड़ों में केविटीज रह जाती है। इसमें फंगस पनपने लगता है।
इसकी वजह से एस्परजिलोसिस का खतरा बढ़ जाता और रोगी को एलर्जी शुरू हो जाती है। यह एलर्जी पूरी तरह से टीबी की तरह ही होती है। टीबी रोगी के पूरी तरह से ठीक होने के बाद भी 60 से 70 प्रतिशत लोगों में खतरा एस्परजिलोसिस होने का हो जाता है। ऐसे रोगियों को सलाह दी जाती है कि वह साल में एक बार जांच जरूर कराएं।
दो तरह का होता है एस्परजिलोसिस
एबीपीए- एबीपीए (एलर्जिक ब्रोंको पल्मोनरी एस्परजिलोसिस) फेफड़ों में फंगस (मुख्य रूप से एस्पर्जिलस) के विरुद्ध होने वाली एक प्रकार की हाइपरसेंसिटिविटी प्रतिक्रिया है। यह रोग ज्यादातर अस्थमा के रोगियों (और कुछ मामलों में सिस्टिक फाइब्रोसिस) के रोगियों में होता है।
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इस स्थिति में रोगी दमा पर जल्द नियंत्रण नहीं कर पाता। इस कारण बहुत हाई डोज में दवाओं की जरूरत पड़ती है। स्थिति यह होती है कि कई-कई दवाओं को एक साथ लेने पर भी रोगी को पूरा आराम नहीं मिल पाता। विशेषज्ञ डाक्टरों से परामर्श न लेने के कारण ज्यादातर रोगी टीबी की दवा खाने लगते हैं।
सीपीए- सीपीए (क्रोनिक पल्मोनरी एस्परजिलोसिस) एक एस्पर्जिलस नामक फंगस से फेफड़ों में होने वाला संक्रमण है। यह ज्यादातर पुरानी ठीक हुई टीबी, पुराने सीओपीडी के रोगियों के साथ ही ऐसे रोगियों में मिलती है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है (जैसे- अनियंत्रित मधुमेह या एचआइवी)।
ऐसे होता है
एस्परजिलस नामक फफूंद के बीजाणुओं को सांस के माध्यम से शरीर के अंदर लेने से एस्परजिलोसिस होता है। ये बीजाणु आमतौर पर मिट्टी, सड़ती हुई पत्तियों, अनाज और नम घरों में पाए जाते हैं। यह रोग कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली या फेफड़ों के पुराने रोगियों को अधिक प्रभावित करता है।
टीबी रोगी यदि पूरी तरह से ठीक भी हो जाते हैं तो सलाह दी जाती है कि वह साल में एक बार जांच जरूर कराएं क्योंकि, अक्सर टीबी रोगियों को एस्परजिलोसिस का रोग होता है। यह खतरा 60 से 70 प्रतिशत रहता है। इस रोग के लक्षण भी टीबी की तरह ही हैं। ओपीडी में रोजाना ऐसे तकरीबन 10 राेगी आते हैं। सीटी स्कैन के साथ ही, ब्रांकोस्कोपी और जांच से फंगस के प्रकार की पुष्टि के बाद उपचार शुरू किया जाता है। -
-डाॅ. देवेश प्रताप सिंह, एडिशनल प्रोफेसर, पल्मोनरी मेडिसिन विभाग, एम्स गोरखपुर। |
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