जागरण संवाददाता, आगरा। प्रदेश में ट्रैफिक उल्लंघन के 11 लाख मुकदमे और चालान समाप्त करने पर सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद प्रदेश सरकार पीछे हट गई है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वह लाल बत्ती जैसे ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन मामलों में मुकदमे वापस नहीं लेगी।
सरकार ने कहा कि वह उस कानून को भी बदलेगी, जिसमें ऐसे मुकदमे और जुर्माने की राशि सामूहिक रूप से प्रदेश भर में माफ कर दी थी। इससे ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन को बढ़ावा मिल रहा था। उधर सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ है।
न्यायालय ने कहा कि वह प्रदेश स्तर पर बनाए गए इस कानून का परीक्षण करेगा कि यह केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के विपरीत तो नहीं बनाया गया है?
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ सड़क सुरक्षा और ट्रैफिक नियमों को लेकर अधिवक्ता केसी जैन की याचिका पर गुरुवार को सुनवाई कर रही थी।
याचिका में आपत्ति की गई थी कि प्रदेश सरकार ने वर्ष 2023 में कानून बनाकर मोटर वाहन अधिनियम में चालान और सजा वाले 11 लाख मामलों को सामूहिक रूप से समाप्त कर दिया था। इस कानून की परिधि में वर्ष 2017 से 2021 तक के एक लाख से अधिक ई-चालान भी माफ हुए थे।
न्यायालय ने इससे पहले 20 नवंबर को सरकार से इस मामले में जवाब तलब किया था। राज्य सरकार ने इस पर शपथ पत्र देकर कहा कि नौ जनवरी 2026 को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में इसको लेकर बैठक की गई। इसमें निर्णय लिया गया कि वर्ष 2023 के कानून में संशोधन कर कुछ श्रेणियों के अपराधों को इसके दायरे से बाहर किया जाएगा।
इनमें यातायात उल्लंघन के वह मामले शामिल होंगे, जिनमें जुर्माना की जगह सजा का प्रविधान है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को 2023 के कानून में शपथ-पत्र के अनुसार संशोधन कर छह सप्ताह में उसे लागू करने का आदेश किया है।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट प्रदेश के इस कानून की संवैधानिकता पर भी विचार करेगा। प्रदेश सरकार द्वारा बनाए गए कानून को न तो राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित किया गया था और न ही स्वीकृति प्राप्त की गई थी।
न्यायमित्र गौरव अग्रवाल ने आशंका जताई कि प्रदेश सरकार द्वारा कानून में किया गया संशोधन व्यावहारिक रूप से समस्या का समाधान नहीं करेगा। स्थिति यथावत रह सकती है।
इस स्थिति में उप्र सरकार के कानून को असंवैधानिक घोषित करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचेगा। राज्य सरकार ने प्रस्तावित संशोधन को पर्याप्त बताया। मामले में अगली सुनवाई नौ अप्रैल को होगी।
44 वर्षों में पांच बार कानून बनाकर समाप्त किए मुकदमे
वरिष्ठ अधिवक्ता और रोड सेफ्टी एक्टीविस्ट केसी जैन ने याचिका में सवाल उठाया था कि ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन से जुड़े मुकदमों को बिना कार्रवाई के समाप्त कर देना क्या सड़क सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था के मूल उद्देश्य के विपरीत नहीं है?
उन्होंने देश में सड़क हादसों में सबसे अधिक मौतें प्रदेश में होने का हवाला देते हुए चालान माफ़ करने और मुकदमे समाप्त करने पर सवाल उठाया था।
राज्य सरकार द्वारा बनाए कानून को निरस्त करने की मांग की थी। वर्ष 1977 से 2023 तक पांच अलग-अलग कानून बनाए गए, जिनके माध्यम से ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के मुकदमे 44 वर्षों में समाप्त किए गए।
ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन से संबंधित मामलों को बिना सुनवाई और निर्णय के समाप्त कर देना उन नागरिकों के साथ अन्याय है, जिन्होंने नियमों का पालन किया या जुर्माना अदा किया।
यह आदेश पूरे देश के लिए स्पष्ट संकेत है कि सड़क सुरक्षा के नाम पर बनाए गए कानूनों को प्रशाासनिक सुविधा के लिए कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। मोटर वाहन अधिनियम में अपराध केवल छोटे चालान नहीं हैं, बल्कि वे सीधे मानव जीवन सुरक्षा से जुड़े हुए हैं।
-केसी जैन वरिष्ठ अधिवक्ता |
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