चार्जशीट के बाद बिना जांच सजा देना अवैध: हाईकोर्ट
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड के कर्मचारी संजीव आनंद को बड़ी राहत देते हुए विभाग द्वारा वर्ष 2015 से 2024 तक पारित सभी दंडात्मक आदेशों को असंवैधानिक करार देते हुए रद कर दिया है।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट कहा है कि जब किसी कर्मचारी को “मेजर पेनल्टी” (बड़ी सज़ा) की चार्जशीट दी जाती है, तो बिना नियमित विभागीय जांच कराए, उस पर “माइनर पेनल्टी” (छोटी सजा) भी नहीं थोपी जा सकती। ऐसा करना कानून के स्थापित सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने निगम को निर्देश दिया है कि संजीव आनंद को उनकी अवैध रूप से रोकी गई सभी सेवा लाभों की राशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित तीन माह के भीतर अदा की जाए।
मामले के अनुसार संजीव आनंद को 18 सितंबर 2012 को कथित अनुशासनहीनता के आरोपों पर चार्जशीट जारी की गई थी। उन्होंने समय पर विस्तृत जवाब दिया और उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने भी उनकी ईमानदारी और कार्यकुशलता के पक्ष में टिप्पणियां दी थीं।
इसके बावजूद बिना कोई विभागीय जांच कराए 24 नवंबर 2015 को उन्हें एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने की सजा सुना दी गई। बाद में 2018, 2023 और 2024 में भी इसी अवैध सजा को बरकरार रखने वाले आदेश पारित होते रहे।
हाई कोर्ट ने पाया कि यह चार्जशीट नियम-7 के तहत “मेजर पेनल्टी” के लिए जारी की गई थी, जिसमें नियमित जांच अनिवार्य होती है। इसके बावजूद निगम ने न तो कोई जांच कराई और न ही विधिवत कारण बताओ नोटिस दिया। इसके अलावा जिस अधिकारी ने सज़ा दी, वह सक्षम प्राधिकारी भी नहीं था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चार्जशीट मेजर पेनल्टी की हो तो बिना जांच मामूली सज़ा भी नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि केवल जवाब लेने या व्यक्तिगत सुनवाई देने से यह कानूनी कमी दूर नहीं होती।
इन सभी आधारों पर हाईकोर्ट ने सभी दंडात्मक आदेशों को रद करते हुए निगम को तीन माह में सभी बकाया लाभ 6 प्रतिशत ब्याज सहित जारी करने का निर्देश दिया है। |