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Karpoori Thakur: फोन से काम नहीं हुआ तो IG के घर पहुंच गए, सादगी और संघर्ष की मिसाल थे बिहार के पूर्व CM

cy520520 2026-1-24 11:26:31 views 990
  

जननायक कर्पूरी ठाकुर। फाइल फोटो



अनिल तिवारी, सीतामढ़ी। भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर जिस प्रकार सत्ता में रहने के बाद भी अपनी सादगी और सौम्यता के लिए जहां ग्लोबल रूप में प्रसिद्ध रहे। उसी प्रकार शासन व्यवस्था के विरोध में भी काफी तीखे भी थे।

आजादी की लड़ाई हो या फिर लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति हो या स्थानीय मुद्दों को लेकर आंदोलन हर भूमिकाओं में उन्होंने अपनी सार्थकता सिद्ध की।

सीतामढ़ी जिले के सोनबरसा विधानसभा क्षेत्र के विधायक रहते हुए उन्होंने अंतिम सांस ली। उस समय उनके जिला प्रतिनिधि रहे मनोज कुमार उर्फ मनोज गुप्ता कहते हैं कि कर्पूरी जी 1985 में नेपाल बार्डर से सटे जिले के सोनबरसा विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी अनवारूल हक को पराजित कर विधायक बने थे। उसके पहले वे 1977-79 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे।

राज्य की सर्वोच्च सत्ता में रहते हुए उनकी सादगी, कर्मठता और सहजता पूरी दुनिया में रेखांकित हुई। इसके बाद उन्होंने नेता विरोधी दल के रूप में विधानसभा काम किया। यहां भी उनकी भूमिका सार्थक विपक्ष के रूप में प्रसिद्धि पाई।

वे हर छोटी-बड़े मुद्दे को लेकर वह न सिर्फ गंभीर रहते थे, बल्कि उसके लिए सड़क पर भी उतर जाते थे। मनोज गुप्ता कहते हैं एक घटना को लेकर कर्पूरी ठाकुर जी ने तत्कालीन आइजी को दो बार पत्र लिखा और कई बार फोन भी किया। इसके बाद स्वयं आइजी उनके पास पहुंचे और तब उन्होंने उन्हें जांच के लिए सीतामढ़ी भेजा।

उन्होंने जनता से जुड़े मुद्दों के लिए सीतामढ़ी की सड़कों पर संघर्ष भी किया। 25 अक्टूबर 1986 को विभिन्न मांगों को लेकर सीतामढ़ी समाहरणालय के समीप लगभग सौ कार्यकर्ताओं के साथ प्रदर्शन करते हुए धरना पर बैठ गए।

विरोध प्रदर्शन में आक्रोश का आलम यह रहा कि प्रशासन को सभी को गिरफ्तार करना पड़ा इसमें कर्पूरी ठाकुर भी शामिल रहे। उस दिन उनकी सादगी के साथ जनहित के मुद्दे पर उनके जुझारूपन की झलक भी परिलक्षित हुई।
हर व्यक्ति का रखते थे ख्याल

वर्ष 2010 से पहले तक जिले में सोनबरसा विधानसभा भी हुआ करता था। कहा जाता है कि वर्ष 1985 में कर्पूरी ठाकुर को सोनबरसा प्रखंड के कुछ लोगों ने यहां से चुनाव में उतरने के लिए आमंत्रित किया था। डा. रामचंद्र पूर्व, रामदेव राय, डा. इंदल सिंह नवीन, रामदेव राय, पंचेलाल राय, मुखिया बिकाऊ महतो और दोस्तियां के राम नारायण अग्रवाल आदि लोग जननायक के घर जाकर उन्हें सोनबरसा सीट से चुनाव में उतरने के लिए तैयार कराया था। कर्पूरी ठाकुर चुनाव जीते थे।

उससे पहले कर्पूरी ठाकुर 1977 से 79 तक दो बार सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके थे। उक्त चुनाव में जननायक का चुनाव चिह्न हल से खेत जोतता किसान था। उनकी लड़ाई कांग्रेस के वैद्यनाथ प्रसाद और निर्दलीय मो. अनवारूल हक से हुई थी।

कर्पूरी जी 12 हजार 500 वोट से जीते थे। उन्होंने चुनाव में जीताने में सक्रिय योगदान देने वाले राम चंद्र पूर्वे को विधान पार्षद बनवाया। अफसोस यहां से चुनाव जीतने के करीब ढाई साल बाद ही कर्पूरी ठाकुर जी का निधन हो गया था।
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