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ओडिशा हाई कोर्ट
संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल। ओडिशा हाई कोर्ट ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) की मूल भावना को मजबूत करते हुए राज्य सूचना आयोग (ओआईसी) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक आरटीआई आवेदक पर नई जानकारी मांगने पर प्रतिबंध लगाया गया था।
अदालत ने साफ कहा कि आरटीआई अधिनियम के तहत किसी नागरिक को जानकारी मांगने से रोकना न्यायसंगत नहीं है और आयोग के पास ऐसा प्रतिबंध लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
न्यायमूर्ति आर.के. पटनायक की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि चाहे कोई आवेदक बड़ी संख्या में आरटीआई आवेदन क्यों न करे, उसे भविष्य में जानकारी मांगने से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने आयोग के आदेश को अवैध करार देते हुए आवेदक पर लगाए गए सभी प्रतिबंध तत्काल प्रभाव से हटा दिए।
क्या था मामला?
ओडिशा राज्य सूचना आयोग ने सितंबर 2025 में चित्तरंजन सेठी नामक आरटीआई आवेदक को कथित रूप से “आरटीआई प्रक्रिया के दुरुपयोग” का दोषी मानते हुए एक साल के लिए नई जानकारी मांगने से रोक दिया था।
आयोग का तर्क था कि वर्ष 2023 में आवेदक ने विभिन्न विभागों में 61 से अधिक आरटीआई आवेदन दाखिल कर सार्वजनिक संसाधनों और प्रशासनिक समय की बर्बादी की है। इसके साथ ही आयोग ने यह शर्त भी लगाई थी कि आवेदक एक कैलेंडर वर्ष में अधिकतम 12 आरटीआई आवेदन ही दे सकेगा।
हाई कोर्ट की अहम टिप्पणियां
- अधिकार का हनन: अदालत ने कहा कि सूचना का अधिकार संविधान और कानून से प्रदत्त नागरिक अधिकार है, जिसे प्रशासनिक आदेश से सीमित नहीं किया जा सकता।
- अनुचित पाबंदी: कोर्ट ने माना कि आवेदनों की संख्या अधिक होना, किसी नागरिक पर भविष्य की जानकारी मांगने पर रोक लगाने का आधार नहीं बन सकता।
- सूचना उपलब्ध कराने का निर्देश: अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि आवेदक द्वारा मांगी गई लंबित जानकारी नियमानुसार उपलब्ध कराई जाए।
आरटीआई कार्यकर्ताओं में संतोष
जनवरी 2026 में आए इस फैसले का आरटीआई कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने स्वागत किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय सूचना के अधिकार की मूल भावना की रक्षा करेगा और अधिकारियों को मनमाने ढंग से आरटीआई आवेदनों पर रोक लगाने से रोकेगा। इसे पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। |
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