काशी के पंचतीर्थ में से एक मणिकर्णिका घाट।
अशोक सिंह, वाराणसी। काशी में मणिकर्णिका घाट पुनर्विकास कार्य में मंदिरों को तोड़े जाने और मढ़ी से अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा अलग होने को लेकर विवाद चल रहा है। इस पूरे विवाद को समझने के लिए मणिकर्णिकाघाट के वर्तमान निर्माण कार्य के साथ महात्म्य, इतिहास और भूगोल को समझना होगा। मणिकर्णिका केवल महाश्मशान ही नहीं काशी के पंचतीर्थ में से एक है।
गंगा तट स्थित पांचों तीर्थों में मणिकर्णिका को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। मान्यताओं के अनुसार शिव और पार्वती जब कुंड का अवलोकन कर रहे थे उस समय पार्वती के कान का मणि, चक्रपुष्करिणी कुंड में गिर गई। इसी कारण कुंड का नाम मणिकर्णिका पड़ा।
तीर्थानां पंचकं सारं विश्वेशानन्द कानने।
दशाश्वमेधं, लोलार्क केशवो बिन्दुमाधवाः
पंचमी तु महा श्रेष्ठा प्रोच्यते मणिकर्णिका
काशीखंड में मणिकर्णिका तीर्थ की महिमा का उल्लेख है। कहा गया \“जहां मृत्यु होना मंगल माना गया है। जहां जीना सफल होता है। जहां स्वर्ग तिनके के समान समझा जाता है वही श्रीमणिकर्णिका तीर्थ है\“। प्राचीन काल में इसका विस्तार बहुत अधिक था।
\“काशी की कन्या मणिकर्णिका\“ के लेखक उपेन्द्र विनायक सहस्त्रबुद्धे कई पुस्तकों के हवाले से बताते हैं कि 18वीं शताब्दी के मध्य शहर की उन्नति मराठों की शक्ति के कारण हुई। मराठे और पेशवा ने काशी में मंदिरों और घाटों का निर्माण कराया।
मणिकर्णिका कुंड का पक्का पुनर्निमाण 1730 में पेशवा बाजीराव के सहयोग से सदाशिव नाइक ने कराया। मान्यता है कि मणिकर्णिका कुंड में डुबकी के बाद गंगास्नान किया जाता है। यहां महिलाएं भी आती हैं।
इसी कारण बाद में अहिल्याबाई होलकर ने दाईं तरफ तारकेश्वर महादेव मंदिर के पीछे महिलाओं के लिए \“यू\“\“ आकार में घाट बनवाया था। इसे \“\“जनाना घाट\“\“ कहा जाता है। इसी की मढ़ी पुनर्विकास कार्य के दौरान टूटी। मढ़ी में उकेरी गई अहिल्याबाई की प्रतिमा निकल गई जिसे प्रशासन संरक्षित किया है। पुनर्विकास के बाद उसे स्थापित किया जाएगा।
इसके दाएं घुड़दौड़ भवन व मरघट मसान नाथ मंदिर है। वर्तमान में इसी के सामने सनातनियाें के शवों को जलाया जा रहा है। इसके दाईं तरफ प्राचीन मणिकर्णिका तीर्थ की शेष भूमि पर जलासेन घाट बना था।
पुनर्विकास कार्य के पहले जलासेन पर ही ज्यादातर शवों को जलाया जाता था। शवों के जलने से उसके पत्थर आदि का नामानिशान नहीं बचा। वहां स्थान की कमी से अपने प्रियजन को मुखाग्नि देने के लिए शव की प्रदक्षिणा मुश्किल होती थी। पास-पास शवों के जलने से पैर जल जाते थे।
वर्तमान में इसी जलासेन घाट पर निर्माण कार्य चल रहे हैं जो बहुत ही धीमा है। इसके बाद श्री विश्वनाथ कारीडोर की बाउंड्री है। मणिकर्णिका तीर्थ के बाईं तरफ की भूमि पर बाद में ग्वालियर के महाराजा दौलतराव सिंधिया की पत्नी रानी बैजाबाई ने पक्काघाट निर्माण कराया। वर्तमान में शवदाह करने आने वाले ज्यादातर लोग यहीं स्नान करते हैं।
घाट के निवासी गौरव द्विवेदी का कहना है कि मणिकर्णिका पुनर्विकास कार्य सिंधिया घाट तक होगा। वर्तमान में मणिकर्णिकाघाट का विस्तार दक्षिण में जलासेन घाट तथा उत्तर में सिंधियाघाट के मध्य है।
दूर-दराज से आने वाले सनातनियों के लिए निश्चित रूप से पुनर्विकास कार्य बेहतर प्रयास है लेकिन सभी को विश्वास में लेकर तेजी से कार्य किया जाय। |
|