search

Martyr Gajendra Singh Gadhiya: सुहाग के गहने उतार बलिदानी को सौंपे… और बिखर गई दुनिया

Chikheang 2026-1-20 19:28:04 views 636
  

बलिदान देने वाले वीर जवान गजेंद्र सिंह गढ़िया का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा कपकोट पहुंचा।



जागरण संवाददाता, बागेश्वर। जब देश के लिए बलिदान देने वाले वीर जवान गजेंद्र सिंह गढ़िया का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा कपकोट पहुंचा, तो सिर्फ एक सैनिक नहीं लौटा था, एक बेटा, एक पति, एक पिता और एक पूरे परिवार की उम्मीद लौटकर आई थी… मगर निर्जीव।

डिग्री कालेज मैदान में जैसे ही शहीद का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, वहां मौजूद हर आंख भर आई। इसके जो दृश्य सामने आया, उसने सन्नाटे को करुड़ क्रंदन में बदल दिया। बलिदानी की पत्नी लीला गढ़िया धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। कांपते हाथों से उन्होंने अपने गले का मंगलसूत्र उतारा, फिर कानों के कर्णफूल और नाक की फुल्ली।

एक-एक कर वह सुहाग के वे चिह्न, जो जीवन भर साथ निभाने के वादे के प्रतीक थे, पति के पार्थिव शरीर पर रख दिए। बिलखते हुए उन्होंने कहा, साथ जीने-मरने का वादा किया था, पर यह वादा रह गया। इतना कहते ही वह फफक-फफक कर रो पड़ीं और बेसुध हो गईं। वहां मौजूद लोगों की आंखें नम थीं, शब्द किसी के पास नहीं थे।
एक झटके में उजड़ गया पूरा संसार

किश्तवाड़ में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान वीर गति को प्राप्त हुए वीथी गैनाड़ गांव निवासी गजेंद्र सिंह गढ़िया अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। उनके बलिदान ने परिवार को अंदर से तोड़ दिया है। पत्नी सदमे में हैं, बच्चे कुछ समझ नहीं पा रहे और मां की आंखों से आंसुओं की धारा थमने का नाम नहीं ले रही।
मां को सुबह मिली बलिदान की सूचना

सोमवार को शहीद के पिता धन सिंह उपचार के लिए कपकोट आए थे। देर होने पर वह भराड़ी में रिश्तेदार के यहां रुक गए। बहू लीला और नाती धीरज-राहुल भी वहीं रुके। गांव में मां चंद्रा गढ़िया तथा बुआ रमुली देवी थीं। मंगलवार सुबह पहले उन्हें कपकोट लाया गया, फिर बेटे के बलिदान की सूचना दी गई। यह सुनते ही मां का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। वह बार-बार यही कहती रहीं, मेरा बेटा ही तो था, जो सब कुछ संभाल रहा था। मां के आंसू देखकर आसपास मौजूद लोग खुद को संभाल नहीं पाए।
पिता की छिन गई बुढ़ापे की लाठी

पुत्र के अंतिम दर्शन करते समय पिता धन सिंह की आंखें छलक पड़ीं। वह कुछ बोल नहीं पा रहे थे। बस तिरंगे में लिपटे बेटे को निहारते रहे। उनके चेहरे पर गर्व था, लेकिन उस गर्व के पीछे असहनीय पीड़ा साफ झलक रही थी, बुढ़ापे की लाठी छिन जाने का दर्द।
बच्चों को नहीं हो पा रहा यकीन

बलिदानी के पुत्र धीरज और राहुल को यह समझने में वक्त लग रहा था कि उनके पिता अब कभी वापस नहीं आएंगे। जब उन्हें बताया गया कि पिता का पार्थिव शरीर हेलीकाप्टर से आ रहा है, तब उनकी आंखें भी भर आईं। मासूम चेहरों पर कई सवाल थे, जिनके जवाब किसी के पास नहीं थे।
अंतिम यात्रा… में गर्व और गम साथ-साथ

बलिदानी की अंतिम यात्रा में पूरा गांव, क्षेत्र तथा जनपद उमड़ पड़ा। छतों से पुष्पवर्षा हुई। भारत माता की जय और जब तक सूरज-चांद रहेगा, गजेंद्र तेरा नाम रहेगा के नारों के बीच सरयू-खीरगंगा संगम पर पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
एक शहादत, जो हमेशा याद रहेगी

गजेंद्र सिंह गढ़िया आज भले ही पंचतत्व में विलीन हो गए हों, लेकिन उनकी शहादत ने उन्हें अमर कर दिया है। एक पत्नी का उजड़ा सुहाग, एक मां की सूनी गोद और दो बच्चों का छिना साया, यह बलिदान सिर्फ एक परिवार का नहीं, पूरे देश का है।

यह भी पढ़ें- Kishtwar में आतंकियों से मुठभेड़ में उत्तराखंड का लाल बलिदान, वीर गजेंद्र सिंह का गांव शोक में डूबा
like (0)
ChikheangForum Veteran

Post a reply

loginto write comments
Chikheang

He hasn't introduced himself yet.

510K

Threads

0

Posts

1610K

Credits

Forum Veteran

Credits
168963