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डीयू में दयाल सिंह ईवनिंग कॉलेज का नाम बदलने पर गहराया विवाद, विरोध में उतरे फैकल्टी

LHC0088 2026-1-15 05:27:27 views 836
  



जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में कॉलेज के नाम परिवर्तन को लेकर विवाद गहराता दिख रहा है। डीयू प्रशासन द्वारा दयाल सिंह (ईवनिंग) कॉलेज का नाम सिख योद्धा बंदा सिंह बहादुर के नाम पर करने की संभावित पहल ने शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच असहमति को जन्म दे दिया है।

कॉलेज की स्टाफ एसोसिएशन ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए इसे ऐतिहासिक विरासत, कानूनी प्रावधानों और संस्थागत परामर्श की प्रक्रिया के खिलाफ बताया है। शिक्षकों के अनुसार, उन्हें इस प्रस्ताव की जानकारी तब मिली जब पिछले महीने 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस के अवसर पर कुलगुरु प्रो. योगेश सिंह ने सार्वजनिक मंच से इसका उल्लेख किया।
क्या है नया नाम रखने का प्रस्ताव?

कुलगुरु ने अपने संबोधन में कहा था कि निर्णय अंतिम चरण में है और दयाल सिंह ईवनिंग कॉलेज (Dyal Singh College) का नाम बंदा सिंह बहादुर के नाम पर रखने की इच्छा है। हालांकि, स्टाफ का कहना है कि इस तरह का कोई भी निर्णय लेने से पहले न तो स्टाफ काउंसिल से चर्चा की गई और न ही छात्रों या गैर-शिक्षण कर्मचारियों से राय ली गई।

गौरतलब है कि दयाल सिंह (मॉर्निंग) और दयाल सिंह (ईवनिंग) कॉलेज एक ही परिसर से संचालित होते हैं। वर्ष 2017 में ईवनिंग कॉलेज के डे कॉलेज बनने के बाद भी दोनों संस्थान एक ही भवन में कार्यरत हैं। स्टाफ एसोसिएशन ने 8 जनवरी को बुलाई गई आपात बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर प्रशासन की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई।
कार्यकारी परिषद की मीटिंग के बाद होगा फैसला

एसोसिएशन ने अपने प्रस्ताव में 22 जून 1978 की ट्रांसफर डीड का हवाला दिया है, जिसके तहत दयाल सिंह कॉलेज को दिल्ली विश्वविद्यालय ने अधिग्रहित किया था। डीड की क्लाज-12 में स्पष्ट है कि कॉलेज का नाम ‘दयाल सिंह कॉलेज’ ही रहेगा। शिक्षकों का कहना है कि इस शर्त का उल्लंघन होने पर भूमि अधिकार वापस लिए जा सकते हैं, जिससे कॉलेज को वर्तमान परिसर छोड़ने तक की नौबत आ सकती है।

डीयू के रजिस्ट्रार विकास गुप्ता ने कहा कि मामला कार्यकारी परिषद के समक्ष रखा जाएगा। उन्होंने तर्क दिया कि दो डे कॉलेज एक ही नाम से नहीं चल सकते, जैसा पहले देशबंधु और रामलाल आनंद कॉलेजों के मामले में किया गया था। अभी इस पर स्वीकृति नहीं मिली है।

यह पहली बार नहीं है जब नाम परिवर्तन का प्रयास हुआ हो। वर्ष 2017 में कॉलेज का नाम ‘वंदे मातरम महाविद्यालय’ रखने का प्रस्ताव भी तीव्र विरोध के बाद वापस लेना पड़ा था। स्टाफ एसोसिएशन ने उसी उदाहरण का हवाला देते हुए मौजूदा प्रस्ताव को तत्काल वापस लेने, स्टाफ काउंसिल की बैठक बुलाने और सभी कानूनी दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की है।

शिक्षकों का कहना है कि किसी भी नाम परिवर्तन से पहले कॉलेज की ऐतिहासिक पहचान, संस्थापक दयाल सिंह मजीठिया की विरासत और कानूनी दायित्वों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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