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उत्तराखंड में कम वर्षा और बर्फबारी से गहराएगा जल संकट, गर्मियों में नदियों में कम हो जाएगी जलधारा

LHC0088 2026-1-6 10:56:35 views 599
  

सांकेतिक तस्वीर।



अशोक केडियाल, जागरण, देहरादून : उत्तराखंड में इस वर्ष शीतकालीन वर्षा और बर्फबारी का दायरा सिमटने से आने वाला ग्रीष्मकाल प्रदेश के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में बीते 73 दिनों से प्रभावी वर्षा नहीं हुई है, जिससे पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक सूखे जैसे हालात बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर संकेतों और शीतकालीन वर्षा की कमी का असर नदियों, कृषि और पेयजल व्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।

कम बर्फबारी के कारण मार्च-अप्रैल में ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया भी धीमी रहने की संभावना है। इसका सीधा प्रभाव गंगा, यमुना सहित अन्य प्रमुख हिमालयी नदियों की जलधारा पर पड़ेगा। अनुमान है कि मई माह तक इन नदियों के जल प्रवाह में 10 से 12 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इससे न केवल पेयजल आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा, बल्कि सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाओं की उत्पादन क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
हिमालयी जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव

वीर माधो सिंह भंडारी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय भरसार के विज्ञानियों का मानना है कि शीतकाल में पर्याप्त वर्षा और बर्फबारी न होने से हिमालयी क्षेत्र की जैव विविधता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। जड़ी-बूटियों, वनस्पतियों और अन्य फोना-फ्लोरा की प्राकृतिक वृद्धि रुक सकती है। साथ ही भूजल रिचार्ज की प्रक्रिया कमजोर होने से जलस्तर गिरने की आशंका है, जिसका असर आने वाले महीनों में और गहरा सकता है।
राज्य की फसल चक्र होगा कमजोर

राज्य के पहाड़ी वर्षा आधारित खेती से लेकर मैदानी क्षेत्रों की फैली कृषि भी कम वर्षा से अछूता नहीं रहेगी। गेंहू, सरसों, तिलहन, दालें की बढ़वार प्रभावित हो रही हैं। कृषि विज्ञानियों के अनुसार उत्तराखंड के पारंपरिक फसल चक्र पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। विशेष रूप से सेब जैसी नकदी फसल के लिए आवश्यक चिलिंग टाइम पूरा न होने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होने की संभावना है।
सदानीरा नदियोंं पर बढ़ेगा दबाव

वर्षा व बर्फबारी न होने से गंगा और यमुना के जलस्रोतों का पर्याप्त रिचार्ज न होने से ये सदानीरा नदियां भी दबाव में आ सकती हैं। विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति विश्व के अन्य क्षेत्रों की तुलना में पहले से ही अधिक है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन और कम होती वर्षा-बर्फबारी भविष्य के लिए गंभीर संकेत हैं।

अध्ययन में यह बात सामने आ रही है कि कम वर्षा व बर्फबारी नहीं होने से भूजल स्तर गिरेगा। प्राकृतिक स्रोत चार्ज नहीं होंगे, ग्लेशियरों का दायरा कम होने से नदियों में पानी की डिस्चार्ज कम होगा। विवि स्तर पर आने वाले महीनों में वर्षा की संभावनाओं का आकलन किया जा रहा है।
-डा. एसपी सती, पर्यावरण विज्ञानी, वीर माधो सिंह भंडारी, उद्यानिकी-वानिकी विवि भरसार

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