search

यादों में मोतीलाल नेहरू : वह बैरिस्टर जिनकी ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 41

नई दिल्ली। पंडित मोतीलाल नेहरू केवल एक प्रधानमंत्री के पिता नहीं थे। वे भारतीय स्वतंत्रता के उस मजबूत और शानदार पुल के समान थे, जिसने एक गुलाम, रूढ़िवादी समाज को आधुनिक, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत की दहलीज तक पहुंचाया।
  मोतीलाल नेहरू को रईसी विरासत में नहीं मिली थी। उन्होंने इसे अपनी मेधा से प्राप्त किया था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (गदर) में जब दिल्ली जल रही थी, तो उनका परिवार अपनी जान बचाकर आगरा भागने पर मजबूर हुआ। पिता गंगाधर की मौत के ठीक तीन महीने बाद जन्म लेने वाले इस बालक का बचपन तंगहाली में बीता।




  लेकिन, 6 मई 1861 को जन्मे मोतीलाल नेहरू कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। अपनी लगन से वकालत की परीक्षा में पूरे प्रांत में प्रथम आए। उनकी कानूनी दलीलें इतनी पैनी होती थीं कि अंग्रेज जज भी खौफ खाते थे। ऐसी भी जानकारी मौजूद है कि एक बार जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान एक बौखलाए ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ने उनसे पूछा, "क्या आप मुझे मूर्ख समझते हैं?" मोतीलाल नेहरू का जवाब था, "बिल्कुल नहीं। लेकिन शायद मैं गलत भी हो सकता हूं।"




  मोतीलाल नेहरू शुरुआत में नरमपंथी थे। वे मानते थे कि अंग्रेजों से बातचीत करके 'डोमिनियन स्टेटस' लिया जा सकता है। लेकिन, 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार ने उनकी रूह को झकझोर दिया। निर्दोषों की लाशें देखकर उन्होंने कहा था, "मेरा खून खौल रहा है।"
  यहीं से मोतीलाल नेहरू का पुनर्जन्म हुआ। उन्होंने अपनी लाखों की वकालत को ठोकर मार दी और पंजाब जाकर उन बेगुनाहों का मुफ्त में केस लड़ने लगे, जिन्हें अंग्रेजों ने फांसी की सजा सुनाई थी। महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद तो मानो उन्होंने अपना पूरा जीवन ही राष्ट्र को सौंप दिया।




  मोतीलाल नेहरू जानते थे कि अंग्रेजों को उनके ही बनाए कानूनों के जाल में कैसे फंसाना है। जब 1922 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया, तो मोतीलाल नेहरू ने सी.आर. दास के साथ मिलकर 'स्वराज पार्टी' बनाई।
  उनका मकसद संसद (केंद्रीय विधान सभा) में घुसकर सिस्टम को जाम करना था। उन्होंने विपक्ष के नेता के रूप में अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। जब अंग्रेज सरकार 'सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक' जैसा काला कानून लाना चाहती थी, तो मोतीलाल नेहरू के तर्कों और रणनीतिक गठजोड़ ने उसे संसद में ही गिरा दिया। यह अंग्रेजों के लिए एक करारा तमाचा था।




  अंग्रेजों का हमेशा ताना रहता था कि भारतीय अपना शासन खुद नहीं चला सकते, वे आपस में ही लड़ते रहेंगे। इस चुनौती को मोतीलाल नेहरू ने स्वीकार किया। 1928 में उन्होंने 'नेहरू रिपोर्ट' पेश की।
  आधुनिक भारत का खाका मोतीलाल ने ही खींचा था। 1928 के उस रूढ़िवादी दौर में, जब दुनिया के कई विकसित देशों में भी महिलाओं को वोट देने का हक नहीं था, मोतीलाल नेहरू ने पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अधिकार और 'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' की वकालत की। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि देश का कोई धर्म नहीं होगा, धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग रखा जाएगा। यह उनके दूरदर्शी और धर्मनिरपेक्ष होने का सबसे बड़ा प्रमाण था।

  मोतीलाल नेहरू और उनके पुत्र जवाहरलाल नेहरू के बीच का रिश्ता भी किसी दिलचस्प फिल्म से कम नहीं था। पिता नरमपंथी और कानून के दायरे में रहने वाले थे, जबकि कैम्ब्रिज से लौटा युवा बेटा समाजवादी और उग्र था। जवाहरलाल नेहरू के विचारों ने पिता को कट्टर साम्राज्यवाद-विरोधी बनाया, और पिता के अनुशासन ने बेटे को एक परिपक्व राजनेता।
  1929 के लाहौर अधिवेशन का वह दृश्य भारतीय इतिहास के सबसे भावुक पलों में दर्ज है, जब एक पिता (मोतीलाल) ने कांग्रेस अध्यक्ष का ताज अपने पुत्र (जवाहरलाल नेहरू) के सिर पर रखा। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में 69 वर्षीय मोतीलाल अपनी खराब सेहत के बावजूद फिर जेल गए। उन्होंने अपना सबसे प्रिय 'आनंद भवन' हमेशा के लिए देश को दान कर दिया। नैनी जेल की सलाखों ने उनके शरीर को तोड़ दिया, लेकिन उनके हौसले को नहीं। 6 फरवरी 1931 को उन्होंने अंतिम सांस ली।






Deshbandhu











Next Story
like (0)
deltin55administrator

Post a reply

loginto write comments
deltin55

He hasn't introduced himself yet.

410K

Threads

12

Posts

1410K

Credits

administrator

Credits
144838