नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगे तो नियोक्ता (संस्था) उसे सस्पेंड कर सकती है, लेकिन विश्वविद्यालय और कॉलेज इस मामले में कानून से अलग अपनी अलग जांच कमेटी नहीं बना सकते।
यह फैसला जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने दिया। कोर्ट रामानुजन कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर रसल सिंह की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उन्होंने अपने सस्पेंशन और दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से बनाई गई एक अस्थायी जांच कमेटी को चुनौती दी थी। यह कमेटी यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जांच के लिए बनाई गई थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रोफेसर रसल सिंह के खिलाफ जारी सस्पेंशन आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कॉलेज के पास जांच पूरी होने तक उन्हें सस्पेंड करने का अधिकार था, लेकिन सस्पेंशन आदेश में जिस तरह की भाषा इस्तेमाल की गई, वह गलत और बदनाम करने वाली थी, इसलिए यह आदेश कानूनी रूप से सही नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि संस्था के पास सस्पेंड करने का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह इसका इस्तेमाल कर सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा कि भले ही पॉश कानून में जांच के दौरान सस्पेंड करने की बात सीधी नहीं लिखी गई है, फिर भी संस्था अपने अधिकार से ऐसा कर सकती है।
हालांकि, कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की उस कार्रवाई पर आपत्ति जताई, जिसमें शिकायत को इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी के पास भेजने से पहले एक अलग फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बना दी गई थी।
अदालत ने कहा कि यह तरीका पॉश कानून के खिलाफ है। कानून में साफ व्यवस्था है कि यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जांच केवल पॉश कानून के तहत बनी समिति ही करेगी।
कोर्ट ने कहा कि पॉश कानून अपने आप में पूरा कानून है। इसके बाहर अलग जांच कमेटी बनाना गलत है और इससे कानून का उद्देश्य कमजोर होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों की जांच केवल कानून के तहत बनी खास समिति ही करें। अलग से बनाई गई जांच कमेटियां गोपनीयता, सही प्रक्रिया और निष्पक्ष जांच को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच पूरी होने से पहले किसी पर 'गंभीर गलत व्यवहार और उत्पीड़न' जैसे शब्द लिख देना गलत है। इससे व्यक्ति की छवि खराब होती है।
हालांकि, कोर्ट ने रामानुजन कॉलेज को यह छूट दी है कि वह कानून के मुताबिक नया सस्पेंशन आदेश जारी कर सकता है।

Deshbandhu
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