नई दिल्ली: Split in Aam Aadmi Party: आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए शुक्रवार का दिन एक बड़े राजनीतिक झटके के रूप में सामने आया, जब पार्टी के प्रमुख नेता राघव चड्ढा समेत कुल सात राज्यसभा सांसदों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया। यह घटना पार्टी के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी टूट मानी जा रही है। इन नेताओं के भाजपा में शामिल होने की खबरों ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है और पार्टी के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
असंतोष संभालने में नाकामी
AAP की राजनीतिक यात्रा शुरू से ही उतार-चढ़ाव भरी रही है। पार्टी के भीतर असंतोष को संभालने में नेतृत्व की कथित विफलता बार-बार सामने आती रही है। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास जैसे संस्थापक सदस्यों का पार्टी छोड़ना इसी प्रवृत्ति का उदाहरण रहा है। ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर इस कमजोरी को उजागर कर दिया है, जहां बड़े स्तर पर नेताओं ने एक साथ पार्टी से किनारा कर लिया।
राघव चड्ढा की नाराजगी बनी बड़ा कारण
सूत्रों के अनुसार, राघव चड्ढा पिछले कुछ समय से पार्टी नेतृत्व से असंतुष्ट थे। राज्यसभा में उपनेता के पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया और आंतरिक मतभेद सार्वजनिक बयानबाजी तक पहुंच गए। माना जा रहा है कि यही असंतोष अंततः बड़े स्तर पर इस्तीफों का कारण बना।
संदीप पाठक की भूमिका ने चौंकाया
इस पूरे घटनाक्रम में पार्टी के वरिष्ठ रणनीतिकार संदीप पाठक की भूमिका को सबसे अहम माना जा रहा है। संगठन विस्तार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और उन्हें केजरीवाल का करीबी माना जाता रहा है। लेकिन सूत्रों का दावा है कि इस बार उन्होंने ही माहौल तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाई। बताया जा रहा है कि पंजाब से जुड़े चार राज्यसभा सांसद भी उनके प्रभाव में भाजपा की ओर झुक गए।
स्वाति मालीवाल पहले ही कर चुकी थीं विरोध
दिल्ली से राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल पहले से ही पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर सामने आ चुकी थीं। मई 2024 में मुख्यमंत्री आवास पर कथित मारपीट के मामले के बाद उन्होंने पार्टी के खिलाफ आवाज उठाई थी। माना जा रहा था कि वह पहले से ही पार्टी छोड़ने का मन बना चुकी थीं और उचित समय का इंतजार कर रही थीं।
AAP का पुराना इतिहास
AAP का इतिहास देखें तो यह पहली बार नहीं है जब पार्टी को इस तरह के संकट का सामना करना पड़ा हो। 2011-12 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली इस पार्टी ने शुरुआत में बड़े-बड़े नामों को जोड़ा, लेकिन समय के साथ कई प्रमुख चेहरे अलग होते चले गए। पार्टी बनने से पहले ही अन्ना हजारे और किरण बेदी ने चुनावी राजनीति में आने के फैसले का विरोध किया था। बाद में किरण बेदी भाजपा में शामिल हो गईं। इसके बाद योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, शाजिया इल्मी, कपिल मिश्रा, कुमार विश्वास, आशुतोष और आशीष खेतान जैसे नेताओं ने भी पार्टी से दूरी बना ली।
हाल के वर्षों में बढ़ी टूट
पिछले कुछ वर्षों में भी पार्टी को लगातार झटके लगे हैं। 2019 में अल्का लांबा ने पार्टी छोड़ दी। जनवरी 2025 में टिकट न मिलने से नाराज सात विधायकों ने इस्तीफा दे दिया। वहीं मई 2025 में 13 पार्षदों ने ‘इंद्रप्रस्थ विकास पार्टी’ नाम से नया मोर्चा बना लिया, यह कहते हुए कि वे सत्ता में होने के बावजूद काम नहीं कर पा रहे थे।
राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल
ताजा घटनाक्रम ने AAP के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन नेताओं को पार्टी का मजबूत स्तंभ माना जाता था, उनका इस तरह से एक साथ जाना संगठन के लिए बड़ा झटका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर पार्टी नेतृत्व जल्द ही स्थिति को संभालने में सफल नहीं होता, तो यह संकट और गहरा सकता है। अब नजर इस बात पर है कि अरविंद केजरीवाल और पार्टी नेतृत्व इस चुनौती से कैसे निपटते हैं और क्या वे संगठन को फिर से एकजुट कर पाते हैं या नहीं।

Editorial Team
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