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किशोरों को सच में बिगाड़ रहा है सोशल मीडिया, ...

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सोशल मीडिया को लेकर कड़े कानूनों के साथ ही जरूरी है कि बच्चों को इसका सुरक्षित इस्तेमाल सिखाया जाए. ऐसा हुआ तो सोशल मीडिया को बैन करने के बजाए, बच्चों के विकास में उसका सही उपयोग किया जा सकेगा.  
हाल ही में इंडोनेशिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन कर दिया. पिछले साल ऑस्ट्रेलिया ने भी ऐसा ही किया था. इन दोनों ही बैन पर आम लोगों की ओर से बहुत विरोध नहीं दिखा.  
लोगों ने सामान्य घटना की तरह इसे स्वीकार लिया. फिर बच्चों की ओर से क्या ही प्रतिक्रिया दिखती! उनके लिए तो अपनी आवाज रखने का जो थोड़ा-बहुत स्पेस था, वो और भी घट गया.  




समाज में बच्चों और किशोरों के 'बिगड़ने' का डर हमेशा से मौजूद रहा है. यह कोई आज का संकट नहीं है. करीब 575 साल पहले आज के जर्मन शहर माइंस में योहानेस गुटेनबेर्ग ने पहला छापाखाना खोला था. तब भी समाज के कई तबकों ने शिकायत की थी कि ज्यादा किताबें युवाओं के दिमाग को जहरीला कर देंगी.  
16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करेगा इंडोनेशिया  
दरअसल निर्णय लेने वाले नहीं चाहते कि ज्यादा लोगों के पास जानकारियां हों, क्योंकि ऐसा हो तो लोग ज्यादा सवाल पूछते हैं. समय बदला, मुद्दे बदले, लेकिन यह बेचैनी अपनी जगह कायम रही. हर पीढ़ी को लगता है कि अगली पीढ़ी किसी नए खतरे से प्रभावित हो रही है और उन्हें 'बिगड़ने' से रोकने की नैतिक जिम्मेदारी उनकी पीढ़ी पर है.  




फिलहाल वही बेचैनी सोशल मीडिया के रूप में सामने खड़ी है. मेटा, यूट्यूब और बाकी प्लेटफॉर्म्स को लेकर कहा जा रहा है कि वे बच्चों को 'भटका' रहे हैं. उनके व्यवहार, भाषा, सोच और सुरक्षित माहौल को नुकसान पहुंचा रहे हैं.  
अमेरिका में कई राज्यों ने इन कंपनियों पर मुकदमे किए हैं और कई नेता उन्हें किशोरों को बिगाड़ने वाली नई चीज बताकर कानून सख्त करने की मांग कर रहे हैं. अदालतों के हालिया फैसलों ने इस बहस को और तेज कर दिया है. इस पूरे विवाद में एक बात बार‑बार छूट जाती है और वो है, फ्री स्पीच के सकारात्मक परिणाम.  




आज जो क्लासिक है, कल बच्चों को भटका रहा था  
निस्संदेह इन प्लेटफॉर्म्स के चलते काफी छोटे बच्चे कई खतरनाक गतिविधियों के निशाने पर आ सकते हैं, या इसके लती हो सकते हैं. लेकिन, जब वे किशोर उम्र में पहुंचेंगे तब इन प्लेटफॉर्म्स के फायदे नुकसान से कहीं ज्यादा हो सकते हैं. समाज हमेशा बच्चों को लेकर हद से ज्यादा डरता रहा है. जो कुछ नया होता है, वह कई बार तुरंत ही खतरनाक मान लिया जाता है. चाहे किताबें हों, फिल्में हों, संगीत हो, या सोशल मीडिया.  




क्या बच्चों का मोबाइल और सोशल मीडिया बैन होना चाहिए?  
आज क्लासिक माना जाने वाला एल्विस प्रेस्ले का डांस और बैटमैन-सुपरमैन जैसे फिक्शनल कैरेक्टर भी इस श्रेणी में रह चुके हैं. हर माध्यम पर आरोप लगाया गया कि यह किशोरों और युवाओं को भटका देगा. लेकिन समय ने कई बार साबित किया है कि ऐसी चीजों को बच्चों के लिए किसी डर की तरह देखना गलत है. बच्चे निष्क्रिय रूप से सिर्फ प्रभावित होने के लिए नहीं बैठे हैं. वे समझते हैं, सीखते हैं, और खुद भी संस्कृति को आकार देते हैं.  

बहुत से अवसर दे सकता है सोशल मीडिया  
मेटा और यूट्यूब जैसी कंपनियों पर वर्तमान गुस्सा कई मायनों में पुराने दौर की सेंसरशिप की याद भी दिलाता है. यह सही है कि सोशल मीडिया पर जोखिम मौजूद हैं. मसलन फेक न्यूज, डिप्रेशन, हैरसमेंट और एल्गोरिद्म के जाल में फंसाने जैसी बातें झूठी नहीं हैं. लेकिन अगर बिना गहराई समझे कानून बनाए गए, तो वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचा सकते हैं.  
बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने की तैयारी कर रहा है यूरोप  

सोशल मीडिया सिर्फ खतरा नहीं है. यह किशोरों और युवाओं के लिए अपनी बात रखने का मंच भी है. यहां वे अपनी पहचान बनाते हैं, वाद-विवाद कर पाते हैं और दुनिया से जुड़ते हैं. यही वह बिंदु है, जिसे राजनीतिक बातचीतों में अक्सर अनदेखा किया जाता है.  
राजनीति अक्सर आसान कहानियों के दम पर आगे बढ़ती है. उसमें एक विलेन है, जिसकी वजह से किशोर और युवा मुश्किल में हैं. पहले यह भूमिका रॉक संगीत निभाता था, फिर वीडियो गेम और अब सोशल मीडिया. लेकिन वास्तविकता की परतें इससे कहीं ज्यादा हैं.  

तकनीक हमेशा चुनौती लाती है, पर अवसर भी साथ लाती है. सोशल मीडिया ने किशोरों और युवाओं को ना सिर्फ मनोरंजन दिया है, बल्कि सीखने, बोलने, संगठित होने और अपनी रचनात्मकता को दुनिया तक पहुंचाने का रास्ता भी खोला है.  
कानून के साथ बच्चों को जागरूक करना जरूरी  
समस्या तब पैदा होती है, जब कानून सिर्फ डर की भावना पर आधारित होकर बनाए जाएं. इतिहास बताता है कि ऐसे कानून अनजाने में बच्चों की आजादी को ही खत्म कर देते हैं. उदाहरण के लिए, अत्यधिक सख्त नियम बच्चों और किशोरों के लिए ऑनलाइन संसाधन, शिक्षा या सहायता पाने के रास्ते सीमित कर सकते हैं. उनकी हिफाजत जरूरी है, लेकिन उन्हें चुप करा देना या हर आवाज को नियंत्रित करना समाधान नहीं हो सकता.  

भारत में भी बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन की मांग  
समाज की इस 'सनातन चिंता' यानी बच्चों और किशोरों के 'भ्रष्ट' होने का डर, अतिवाद को जन्म देता है. भविष्य की पीढ़ियों को तैयार करने का असली तरीका सेंसरशिप नहीं, बल्कि भरोसा, मार्गदर्शन और संवाद है.  
मतलब एक ओर कानूनी प्रक्रिया बनाई जाए, जिसके तहत बच्चों और किशोरों को नुकसान पहुंचाने पर कड़ी सजा हो. उससे भी ज्यादा अहम होगा कि टीनएज बच्चों को सोशल मीडिया का सुरक्षित और बेहतर ढंग से इस्तेमाल सिखाया जाए. डिजिटल दुनिया नई है, पर इसमें भी इंसानी डर पुराने ही हैं. हमें यह तय करना होगा कि हम कानून को भय का आधार देना चाहते हैं या समझ का.






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