जागरण संवाददाता, कानपुर। तेजी से कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे शहरों के सचेत होने की बारी है। आईआईटी कानपुर की शोध रिपोर्ट के अनुसार हिमालय में आए तीव्र भूकंप का असर कानपुर व प्रयागराज जैसे शहरों पर भी पड़ सकता है।
सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर निहार रंजन पात्रा की रिसर्च के मुताबिक, यदि निर्माण कार्यों में भूकंपरोधी नियमों की अनदेखी की गई तो रेत से भरे बेड पर टिके कानपुर व प्रयागराज में बड़ी तबाही आ सकती है। प्रोफेसर पात्रा ने वर्ष 2008 से देश के विभिन्न राज्यों (गुजरात, हरियाणा, उप्र, बिहार) की मिट्टी का अध्ययन कर एक अर्थक्वेक हैजर्ड मैप (भूकंप जोखिम मानचित्र) तैयार किया है।
इस प्रोजेक्ट को सीएसआइआर, डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलाजी और बीआरएनएस से सहायता मिली है। अध्ययन के दौरान कानपुर व प्रयागराज में विशेष रूप से 43 से अधिक स्थानों पर 80 मीटर की गहराई तक बोरहोल कर मिट्टी के नमूने लिए गए, ताकि जमीन के भीतर की संवेदनशीलता को समझा जा सके।
प्रो. पात्रा ने बताया कि कानपुर व प्रयागराज की मिट्टी भूकंपीय तरंगों को सोखने के बजाय उन्हें पूरी ताकत के साथ सतह तक पहुंचा देती है, जिससे नुकसान की तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है।
कानपुर-प्रयागराज में लिक्विफैक्शन का बड़ा खतरा
रिसर्च में सबसे चौंकाने वाली बात लिक्विफैक्शन से जुड़ी है। आमतौर पर भूकंप के दौरान जमीन के 8-10 मीटर नीचे लिक्विफैक्शन का असर दिखता है, लेकिन कानपुर व प्रयागराज में यह खतरा 30 से 40 मीटर की गहराई तक देखा जा सकता है।
इन शहरों की ऊपरी परत (8-10 मीटर) रेतीली, ढीली और पानी से संतृप्त है। भूकंप के दौरान यह मिट्टी अपनी मजबूती खोकर कीचड़ या तरल पदार्थ की तरह व्यवहार करने लगती है। इससे बहुमंजिला इमारतें झुक सकती हैं, सड़कें धंस सकती हैं और पुल गिर सकते हैं।
प्रो. पात्रा ने सुझाव दिया है कि विदेश की तर्ज पर भारत में भी निर्माण से पहले अर्थक्वेक हैजर्ड मैप का अनिवार्य रूप से इस्तेमाल होना चाहिए।
ग्राउंड इंप्रूवमेंट तकनीक की मदद से भवनों का निर्माण करने से पहले मिट्टी की क्षमता बढ़ाने वाली तकनीकों को अपनाना होगा। बिल्डिंग कोड व सुरक्षा नियमों की अवहेलना भारी जान-माल की हानि का कारण बन सकती है।
गंगा किनारे वाले इलाके सबसे ज्यादा संवेदनशील
अध्ययन के अनुसार, गंगा के तटीय और निचले इलाके, जहां की मिट्टी रेतीली है, सबसे अधिक जोखिम वाले क्षेत्र हैं। कानपुर के वाजिदपुर, बिठूर, मंधना, पनकी, बर्रा, चकेरी और न्यू कानपुर सिटी आदि 25 से अधिक इलाकों की मिट्टी की जांच में अत्यधिक संवेदनशीलता पाई गई है।  |