श्रीरामचरितमानस और सत्संग का आध्यात्मिक दर्शन।
स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। श्रीरामचरितमानस सच्चिदानंदमय है। यह ग्रंथ जीवन की ग्रंथियों को खोलने की कुंजी है। राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहं मोह निसा लवलेसा।। श्रीमद्भागवत में कृष्णद्वैपायन व्यास जी महाराज ने भी भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति सच्चिदानंद (सत, चित, आनंद) रूप में ही की है -
सच्चिदानंदरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतिवे।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नवम:।।
इस सच्चिदानंद स्वरूप को आत्मसात करने के लिए आवश्यक है कि हम सत्संग का आश्रय लें। मायारहित होने के कारण यह सत् है। जड़ता के अभाव के कारण यह ग्रंथ चित है। वहीं, विक्षेप और दुख न होने के कारण यह आनंदस्वरूप है। श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के लिए सच्चिदानंद शब्द का अध्यारोप नहीं किया गया है, अपितु इस ग्रंथ के प्रमुख देवता भगवान श्रीराम का स्वरूप ही सत, चित, आनंद स्वरूप है। राम ही सत हैं, राम ही चित हैं, राम ही आनंद हैं। जिसको भक्तियुक्त ज्ञानदृष्टि से देखा जा सकता है। श्रीरामचरितमानस के सात सोपान सप्तवर्ण के प्रतीक हैं।
राम के नाम, स्वरूप दर्शन, लीला और उनके धाम में निवास का सौभाग्य उन सात सोपानों में प्रवेश के साधन हैं। भगवान के प्रति आत्मनिष्ठा के बिना व्यक्ति उनकी लीला को लेकर केवल व्यक्ति विषयक प्रश्न करेगा, जिसका परिणाम होगा कि प्रश्न और उत्तर दोनों मिथ्या सिद्ध हो जाएंगे। सत्संग ही एक ऐसा संवाद है, जो व्यक्ति को तत में स्थित कर सकता है, क्योंकि सत्संग में त्वम पदार्थ का लय तत में होता है, जिसको भक्ति शास्त्र में शरणागति कहते हैं।
दिव्यदृष्टि और कृपादृष्टि का अलौकिक भेद क्या है? व्यक्ति के मन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो वर्तमान केवल सुख, शांति, आनंद को अनुभव करने के लिए होता है, व्यक्ति उसी काल में भूत और भविष्य की कल्पना करके अपने चतुर्पुरुषार्थ अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों से प्राप्त होने बाले सुख से नितांत वंचित रहता है। सुख को अनुभव कर ही नहीं पाता है।
1. अर्थ में सुख है, इसका सुख भी वर्तमान में होगा।
2. धर्म पालन के लिए जो कर्मकांड किया जाता है, अज्ञानी व्यक्ति प्रत्येक कर्म के पीछे किसी न किसी फलाकांक्षा के कारण धर्म सुख भी नहीं ले पाता है। कर्म करने का सुख ही सुख होता है, कर्म फल की आकांक्षा चूंकि अनंत होती है और बढ़ती ही जाती है, इस कारण वह कर्म और धर्म के स्वरूप को समझ ही नहीं पाता है।
3. काम को शरीर का विकार बताकर उसी विकार की आकांक्षा करते रहने से वह काम के प्रांजल और लोककल्याणकारी स्वरूप से वंचित रहता है। विकार तो निर्विकार के प्राकट्य का उपादान हो सकता है। विकार तब होता है, जब वह विकारी के अंदर होता है। निर्विकारी को न उसकी आकंक्षा है और न ही प्राप्ति के अभाव में कोई क्षोभ है।
4. मोक्ष के सुख का अनुभव तो भक्ति के बिना संभव ही नहीं है और भक्ति शरीर पर आश्रित है। शरीर ही नहीं होगा तो भक्ति होगी कैसे? भक्त का कोई कार्य अपने लिए होता ही नहीं है और वह करने वाला भी केवल भगवान को ही मानता है। वहां पर चूंकि कर्ता का अभाव है, इसलिए भक्त मोक्ष चाहता ही नहीं है,
सगुनोपासक मोक्ष न लेहीं। तिन्ह कहुं राम भगति निज देहीं।।
चारों पुरुषार्थों के ऊपर है भक्ति, भक्त और भगवंत। सत्संग में अहंकार का लय होने के कारण ही साधक अपनी श्रुति से श्रुति के तत्व को सुनता है, परिणामत: पूर्वपक्ष जब अपने अंदर अभाव को स्वीकार कर लेता है इसी कारण उत्तरपक्ष को शिरोधार्य कर वह सत, चित, आनंद से तदरूप हो जाने के कारण आत्मरूप हो जाता है। विकारी शरीर छोड़ने या घर से भाग जाने को मोक्ष मानता है, इसीलिए वर्तमान में होने वाले दुख में कारण रूप दूसरे को देखने के कारण वह सुख के उपाय के लिए जो प्राप्त है, उसमें सुख न लेकर किसी कल्पित व्यक्ति या पदार्थ को अपने कल्पित सुख की कल्पना की पूर्ति के लिए माध्यम रूप में चुन लेता है और काल, कर्म, स्वभाव और गुण को मोक्ष का विरोधी मानकर वह किसी कल्पित मोक्षरूप अंधकूप में चला जाता है।
वस्तुत: काल, कर्म, स्वभाव और गुणों का योग जब तक भगवान से नहीं होगा, हम माया, जड़ता तथा दुख क्लेश से मुक्त होकर अपने सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित नहीं हो सकते हैं। व्यक्ति जब मोहग्रस्त होता है, तब वह आत्मा में अपने विकारों का ही अध्यारोप करता है। दर्पण रूप आत्मा में स्वयं के विकारों को देखने के लिए असीम विनम्रता, भगवद्भक्ति, समर्पण और अहंशून्यता की आवश्यकता है। यदि हमने अपनी सांसारिक दृष्टि का चश्मा उतारकर भगवान की दी हुई कृपादृष्टि का उपयोग नहीं किया, हमारी दिव्य दृष्टि धृतराष्ट्र को सत्य दिखाने और बताने की तरह व्यर्थ चली जाएगी। कृपादृष्टि का तात्पर्य है कि अर्जुन की तरह हमें यह अनुभव हो कि प्रभु! आपकी कृपा से हमारा मोह नष्ट हो गया। अब हम अपनी स्व-स्थिति में स्थित हैं। यह हमारी उपलब्धि है, जो आपके कृपापूर्ण हेतुरहित सत्संग से प्राप्त हुई है। अब हम वही करेंगे, जो आप कहेंगे।
नष्टो मोह:स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसाद्न्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गत संदेह: करिष्ये वचनं तव।।
भगवान ने गीता में अर्जुन से यही कहा कि तूने जो चश्मा पहन रखा है, वह तुझे न तो संसार को देखने योग्य रखेगा, न ही तू सत्य को देख पाएगा। अंत में तू केवल उपहास का पात्र बनकर रह जाएगा। धृतराष्ट्र की दृष्टि ही नहीं है। गांधारी ने आंख पर पट्टी बांध ली है और तूने आंख पर मोह का पर्दा डाल लिया है, जिसके कारण तू मुझसे न समझ कर मुझे ही समझा रहा है। भगवान ने कहा कि अब इसका मार्ग केवल यही बचा है कि तू मेरी कृपादृष्टि से देख।
जैसे संजय अपने गुरु वेदव्यास की दिव्यदृष्टि से देख रहा है, तू मेरी दी हुई कृपादृष्टि से देख। वेदव्यास की दिव्य दृष्टि केवल दूर के दृश्य दिखा सकती है, पर कृपादृष्टि की विशेषता है कि व्यक्ति अपना और अपने कर्मों में ईश्वर का संकल्प देखकर सत की ओर प्रवृत्त होकर समाज और अपना कल्याण करने में समर्थ होता है। यही सत्संग का प्रतिफल है।
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