एक्सपायर्ड दवाओं के निपटान पर राष्ट्रीय नीति की मांग। (AI Generated Image)
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। Antibiotics Awareness देश में मरीजों द्वारा खरीदी गई अनुपयोगी (अनयूज) और एक्सपायर्ड दवाओं-सीरप की वापसी (ड्रग टेक-बैक) और वैज्ञानिक डिस्पोजल की अनिवार्य राष्ट्रीय नीति ही नहीं है।
वह भी तब जब देश में एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) के बढ़ते खतरे को देखते हुए राषट्रीय स्तर पर ‘वन हेल्थ’ प्रोग्राम लागू है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में दवाओं के अनुचित उपयोग न करने का आह्वान करते हुए एएमआर के खतरे पर चिंता जता चुके हैं।
बावजूद इसके भारत में फार्मास्यूटिकल कंपनियों, केमिस्टों और अस्पतालों को दवाओं की वापसी और उसके वैज्ञानिक डिस्पोजल के लिए जवाबदेह तक भी नहीं बनाया गया हैं। यही कारण देश में अधिकांश दवा (केमिस्ट) दुकानें बिक चुकी या एक्सपायरी दवाओं को वापस लेने से इनकार कर देती हैं।
नतीजतन, ये दवाएं और सीरप कूड़े-कचरे में फेंक दी जाती हैं या नालियों में बहा दी जाती हैं, इससे पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ एएमआर जैसी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती गहराती जा रही हैं।
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पीएम और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री को पत्र
एएमआर के अब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य दवा वापसी और सुरक्षित निस्तारण प्रणाली लागू करने की मांग की है।
आइएमए एएमआर कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. नरेन्द्र सैनी ने बताया कि दवाओं का अनुचित निपटान न केवल मिट्टी व जल स्रोतों को प्रभावित करता है, बल्कि यह बैक्टीरिया में दवा प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने का खतरा भी बढ़ाता है।
सुझाव दिया है कि अमेरीका और यूरोपीय देशों की तर्ज पर भारत में भी फार्मास्यूटिकल कंपनियों, केमिस्टों और अस्पतालों को दवाओं की वापसी व उनके वैज्ञानिक डिस्पोजल के लिए जवाबदेह-जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए।
12 लाख से ज्यादा लाइसेंसी फॉर्मेसी
दवा बाजार के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में 12 लाख से अधिक लाइसेंस प्राप्त फार्मेसी दुकानें संचालित हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन के आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रतिवर्ष करीब 4.2 लाख करोड़ का कारोबार होता है।
देश में तीन हजार से अधिक दवा निर्माता कंपनी और 10 हजार से अधिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हैं। विभिन्न अध्ययनों और सर्वे के अनुसार घरेलू स्तर पर खरीदी गई दवाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अनुपयोगी या एक्सपायर्ड होकर बर्बाद हो जाता है।
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इस समाचार में उपयोग किए गए क्रिएटिव ग्राफिक्स को NoteBookLM आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस प्रोग्राम की सहायता से बनाया गया है।
अनुमान है कि घरेलू बाजार में लगभग 1.5 प्रतिशत दवाएं अपशिष्ट के रूप में नष्ट होती हैं, जिसका बड़ा हिस्सा घरों से आता है। ‘प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से पत्र के माध्यम से अनयूज और एक्सपायर्ड ड्रग टेक-बैक और वैज्ञानिक डिस्पोजल की अनिवार्य राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई है।’ -
डॉ. नरेन्द्र सैनी, अध्यक्ष, एएमआर कमेटी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन
इस समाचार में उपयोग किए गए क्रिएटिव ग्राफिक्स को NoteBookLM आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस प्रोग्राम की सहायता से बनाया गया है। |