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छांयसा का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है ‘बीमार’, गांव में फैले हेपेटाइटिस से अब तक 4 मौतें और 50 से ज्यादा संक्रमित

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गांव में बढ़ते संक्रमण के बाद शिविर लगाकर शुरू की गई है जांच। जागरण



कुलवीर चौहान, पलवल। हेपेटाइटिस और पीलिया से जूझ रहे छांयसा गांव में ग्रामीणों को उपचार देने वाला प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुद बीमारू हालत में है। गांव में बीते कुछ समय से ये बीमारियां तेजी से पांव पसार रही हैं, लेकिन स्वास्थ्य केंद्र में न तो डाॅक्टर हैं, न दवा और न स्वास्थ्य जांच होती है। अनदेखी के चलते केंद्र की हालत भी जर्जर होने लगी है। यदि इस केंद्र में उचित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होती तो शायद इस बीमारी का पहले ही पता लगाकर काबू पाया जा सकता था।
स्वास्थ्य केंद्र के प्रति अनदेखी

गांव में चार मौत हेपेटाइटिस बी व सी से हुई हैं। जबकि तीन मौतें पीलिया से बताई जा रही हैं, जो हेपेटाइटिस का प्रमुख लक्षण होता है। गांव में 50 से ज्यादा लोगों में हेपेटाइटिस बी व सी की पुष्टि हुई है। बीमारियों के बढ़ते प्रकोप से गांव में दहशत का माहौल। ग्रामीण भी हेपेटाइटिस और पीलिया से हुई मौतों के लिए स्वास्थ्य विभाग की इस स्वास्थ्य केंद्र के प्रति अनदेखी को मान रहे हैं।

  
स्वास्थ्य केंद्र में नहीं है स्टाफ

जानकारी के अनुसार 2010 में तत्कालीन मुख्य संसदीय सचिव जलेब खान ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण कार्य का शिलान्यास किया था, लेकिन वर्षों तक इसका निर्माण कार्य अटका रहा। 2015 में दोबारा काम शुरू हुआ और 2018 में भवन बनाकर स्वास्थ्य विभाग को सौंप दिया गया, लेकिन चार साल तक यह शुरू नहीं हो पाया। आखिरकार 2022 में इसका उद्घाटन हुआ।
मरीजों को उचित उपचार नहीं मिल पाता

दावे किए गए कि छांयसा के साथ ही मठेपुर, दुरेन्ची, बीघावली, हुचपुरी, स्वामिका, महलुका आदि गांवों की 40 हजार से अधिक की आबादी को इसका फायदा मिलेगा, लेकिन महज चार साल पहले शुरू हुआ यह केंद्र आज खुद इलाज का मोहताज नजर आता है। स्वास्थ्य केंद्र में स्टाफ की कमी से मरीजों को उचित उपचार नहीं मिल पाता है।
स्वास्थ्यकर्मियों के पांच में से दो पद खाली

केंद्र में दो मेडिकल अधिकारी के पद स्वीकृत हैं जबकि इनमें से एक ही भरा हुआ है। उक्त मेडिकल अधिकारी के पास हथीन का भी प्रभार है। इसी तरह स्टाफ नर्स के पांच पदों में से दो खाली हैं। फार्मासिस्ट का पद खाली है। बहुउद्देशीय स्वास्थ्यकर्मियों के पांच में से दो पद खाली हैं।

  
झोलाछापों पर निर्भर ग्रामीण

फार्मासिस्ट नहीं होने से दवाओं का वितरण और स्टाक भी केंद्र में समय पर नहीं पहुंच पाता है। केंद्र में दवाओं का वितरण स्टाफ नर्स के भरोसे रहता है। हेपेटाइटिस और पीलिया के बढ़ते संक्रमण के बाद मचे हड़कंप को देखते हुए अब तो केंद्र पर दवाएं मौजूद हैं, लेकिन ज्यादातर समय दवाओं का अकाल रहता है।

इसी तरह टेस्ट और स्वास्थ्य जांच भी नहीं हो पाती है। स्वास्थ्य सेवाओं और जांच की कमी के कारण सामान्य बुखार होने की सूरत में भी ग्रामीणों को निजी क्लीनिक का रुख करना पड़ता है या वे झोलाछापों पर निर्भर रहते हैं।

स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में गांव में फैले हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण को फैलने में झोलाछापों की भूमिका भी सामने आई है। यह झोलाछाप एक ही सिरिंज को कई बार उपयोग करते हैं। साथ ही मरीजों को उपचार के लिए स्टेराइड भी देते हैं। इससे भी गांव में इस संक्रमण के फैलने का अंदेशा जताया जा रहा है।

  
इमारत भी होने लगी जर्जर, अस्पताल में उगी झाड़ियां

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के साथ यह लचर व्यवस्था का भी शिकार है। अस्पताल में चारों तरफ झड़ियां उगी हुई हैं। अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता भी कच्चा है, जिसके कारण बरसात के दिनों में यहां जलभराव हो जाता है। ऐसे में मरीजों को अस्पताल तक पहुंचना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता है।

आश्चर्य की बात यह है कि जिस इमारत को बने अभी केवल चार वर्ष हुए हैं, उसकी स्थिति अभी से जर्जर होने लगी है। केंद्र की खिड़कियां और दरवाजे टूट चुके हैं। छत जगह-जगह से झड़ने लगी है और लेंटर भी टूटकर गिरने की अवस्था में है।


“स्वास्थ्य केंद्र में अधिकतर समय न तो डाक्टर रहते हैं और न ही दवाएं। स्वास्थ्य जांच की भी उचित व्यवस्था नहीं होती है। इस स्वास्थ्य केंद्र को जाने वाला रास्ता कच्चा है, जिस पर वर्षा के मौसम में कई-कई फुट तक पानी भर जाता है।“

-इस्लाम, सरपंच, छांयसा

“पूरे हथीन में ही डाॅक्टरों और स्टाफ की कमी है। समय-समय पर इस कमी को दूर करने के प्रयास किए जाते हैं। जो भी पद रिक्त हैं उन्हें भरा जाएगा। अभी बढ़ते संक्रमण को देखते हुए गांव में स्वास्थ्य जांच शिविर लगाए गए हैं। इनमें सभी डाॅक्टर और जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं।“

-सतिन्द्र वशिष्ठ, जिला सिविल सर्जन


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