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युवराज मेहता मौत मामले में बिल्डर निर्मल सिंह को अग्रिम जमानत, कोर्ट ने कहा- प्रत्यक्ष भूमिका का साक्ष्य नहीं

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सेक्टर-150 में बेसमेंट के लिए खोदे गए प्लाॅट में भरे पानी में कार समेत गिरकर जान गंवाने वाले इंजीनियर युवराज मेहता की मौत का मामला।



जागरण संवाददाता, ग्रेटर नोएडा। जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल श्रीवास्तव की अदालत ने सेक्टर-150 में बेसमेंट के लिए खोदे गए प्लाॅट में भरे पानी में कार समेत गिरकर जान गंवाने वाले इंजीनियर युवराज मेहता की मौत मामले में आरोपित बिल्डर निर्मल सिंह को अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने सुनवाई में पाया प्रथम दृष्टया आरोपित की प्रत्यक्ष या सचेत भूमिका स्थापित करने वाला ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। उसकी कस्टोडियल पूछताछ आवश्यक प्रतीत नहीं होती। अदालत ने कहा कि वह बिना अनुमति देश नहीं छोड़ेंगे और जांच में सहयोग करेंगे।
निर्माण पर प्राधिकरण ने लगाई थी रोक

आरोपित बिल्डर के अधिवक्ता बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज भाटी बोड़ाकी व सचिव शोभाराम चंदीला ने दलील दी कि आरोपित प्रतिष्ठित व्यवसायी और डेवलपर हैं। एफआईआर में उनका नाम स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है। वह संबंधित कंपनी के निदेशक या की-मैनेजरियल पर्सन नहीं रहे हैं। निर्माण पर दो वर्ष से अधिक समय से नोएडा प्राधिकरण द्वारा रोक लगा रखी गई थी।
अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली

सत्र अदालत ने पाया कि रिकाॅर्ड से प्रथम दृष्टया यह स्थापित नहीं होता कि आरोपित का विवादित भूमि पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण था। संबंधित दस्तावेज प्राधिकरण या जांच एजेंसी के पास उपलब्ध हैं, जिनके लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी नहीं। अदालत ने तथ्यों, आरोपों की प्रकृति, सजा की सीमा, प्रथम दृष्टया भूमिका के अभाव और कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता न होने को देखते हुए निर्मल सिंह की अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली।
प्रमोटर होने के नाते बताया जिम्मेदार

अभियोजन ने दलील दी कि आरोपित कंपनी के प्रमोटर होने के नाते जिम्मेदार हैं। अदालत ने कहा कि प्रमोटर शब्द की स्पष्ट कानूनी परिभाषा और दायित्व का निर्धारण रिकाॅर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों से स्थापित नहीं होता। जलभराव की समस्या को लेकर विशटाउन प्लानर्स द्वारा 2022 में आवेदन दिया गया था।

सिंचाई विभाग द्वारा 2023 में जलनिकासी के लिए प्रस्ताव रखा गया था। आदेश में उल्लेख किया कि नोएडा प्राधिकरण की बोर्ड बैठक में 18 जनवरी 2021 को संबंधित भूखंड पर निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गई थी।

बाद में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में जनवरी 2026 में यह प्रतिबंध हटाया गया। निर्माण और विकास कार्य पर वैधानिक रोक लागू थी। ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना कि आरोपित ने जानबूझकर पानी जमा रहने दिया, इस स्तर पर उचित नहीं है।

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