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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रमजान का महीना सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह खुद को तराशने, अपनी इच्छाओं पर काबू पाने और अपनी रूह को शुद्ध करने का एक गहरा मानवीय अनुभव है। यह महीना हमें सिखाता है कि असल इंसानियत क्या है और संयम के जरिए हम खुद को कैसे बेहतर बना सकते हैं।
संयम और आत्म-नियंत्रण का विज्ञान
अक्सर लोग रोजे को सिर्फ सुबह से शाम तक भूखे-प्यासे रहने के रूप में देखते हैं, लेकिन इसका दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है। इसके मुख्य आधार इस प्रकार हैं:
- तकवा की प्राप्ति: रोजे का असल मकसद \“तकवा\“ हासिल करना है, जिसका अर्थ है- परहेजगारी या बुराइयों से बचने की शक्ति।
- इच्छाशक्ति का विकास: जब एक इंसान अपनी सबसे बुनियादी जरूरतों, जैसे भोजन और पानी को अपनी मर्जी से छोड़ देता है, तो उसके भीतर गजब का आत्मविश्वास और सेल्फ-कंट्रोल (Self Control) पैदा होता है।
- बुराइयों पर लगाम: यह प्रक्रिया सिखाती है कि अगर हम अपनी भूख पर काबू पा सकते हैं, तो झूठ, लालच और गुस्से जैसी सामाजिक बुराइयों को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
- मानसिक अनुशासन (Mental Descipline): रोजा केवल पेट का नहीं, बल्कि आंखों, जुबान और विचारों का भी होता है, जो इंसान को एक अनुशासित जीवन की ओर ले जाता है।
बदलते मौसम और इबादत का संतुलन
इस साल रमजान का महीना मार्च के सुखद समय में आया है। चूंकि. इस्लामिक कैलेंडर चंद्रमा की चाल पर आधारित होता है, इसलिए रमजान का महीना (Ramadan Ka Mahina) हर साल लगभग 10 से 11 दिन पीछे खिसकता है। इसके पीछे एक बहुत ही खूबसूरत दर्शन छिपा है।
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यह व्यवस्था इसलिए है ताकि दुनिया के हर कोने में रहने वाला इंसान साल के हर मौसम- चाहे वह कड़ी धूप हो, कड़कड़ाती ठंड हो या फिर मार्च जैसा सुहाना मौसम में इबादत और सब्र का अनुभव कर सके। यह बदलाव इंसान को हर हाल में शुक्रगुजार रहना सिखाता है।
ज्ञान और कुरान का प्रकाश
रमजान का रिश्ता सीधे तौर पर ज्ञान और रूहानियत से जुड़ा है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और धार्मिक मान्यताओं में दर्ज है कि इसी पवित्र महीने की एक बेहद खास रात, जिसे \“शब-ए-कद्र\“ कहा जाता है। जिसमें मानवता का मार्गदर्शन करने वाली किताब \“कुरान\“ का अवतरण शुरू हुआ था। इसीलिए, इस पूरे महीने में पढ़ने, समझने और चिंतन करने पर विशेष जोर दिया जाता है। यह अंधेरे से रोशनी की ओर बढ़ने का प्रतीक है।
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