search

नाम में क्या रखा है? देसी जुबान में ढलते विदेशी स्वाद और गलत उच्चारण की दिलचस्प कहानी

cy520520 4 hour(s) ago views 720
  

देसी जुबान में ढलते विदेशी स्वाद और गलत उच्चारण(सोशल मीडिया)



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में भाषा कभी सख्त नियमों में नहीं बंधी रही। यहां शब्द चलते‑चलते बदल जाते हैं, लहजे रास्ते में मुड़ जाते हैं और उच्चारण अकसर अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। शायद यही वजह है कि जब एक वीडियो में क्रोइसां अचानक \“प्रशांत\“ बन गया, तो वह सिर्फ एक मजाक नहीं रहा, बल्कि एक सांस्कृतिक पल बन गया।
जब क्रोइसां बना ‘प्रशांत’

एक छोटे से लड़के का पूरे आत्मविश्वास के साथ फ्रेंच पेस्ट्री को गलत नाम से पुकारना इंटरनेट पर छा गया। लेकिन असली कहानी तब बनी, जब एक बड़े भारतीय ब्रांड ने उसे सुधारने की बजाय अपनाने का फैसला किया और अपने क्रोइसां को ही प्रशांत\“ नाम दे दिया। यह पल बताता है कि भारत में किसी चीज को अपना बनाने का सबसे आसान तरीका उसे अपनी जुबान में ढाल लेना है।
विदेशी खाने, देसी ज़ुबान

भारत में विदेशी खाने के नाम शायद ही कभी सही-सलामत आते हैं। लोगों को किसी भी खाने का नाम कुछ भी कह देने में किसी को झिझक नहीं होती। इसके बावजूद, खाने का मजा कम नहीं होता। बल्कि कई बार यह गलतियां अनुभव को और यादगार बना देती हैं।

यह केवल अनभिज्ञता का मामला नहीं है, बल्कि अपनाने की प्रक्रिया है। एक ऐसे देश में जहां हर कुछ किलोमीटर पर भाषा बदल जाती है, लोग नए शब्दों को समझने के लिए अपने आस-पास की ध्वनियों का सहारा लेते हैं। अनजान शब्दों को जाना-पहचाना बनाने की यही कोशिश अक्सर हंसी और रचनात्मकता को जन्म देती है।

पुणे के आईटी प्रोफेशनल नवदीप तुपे को याद है कि पहली बार जब उन्होंने मैक्सिकन रेस्टोरेंट में ‘केसाडिला’ ऑर्डर करने की कोशिश की, तो वे अटक गए। शब्द उन्हें फिल्मों और टीवी से पता था, लेकिन ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी। काउंटर पर खड़ी महिला ने उन्हें एक देसी तरकीब बताई। इसे ऐसे बोलो जैसे कैसे दिया। बस फिर क्या था, शब्द हमेशा के लिए याद हो गया। कभी‑कभी सही उच्चारण से ज़्यादा जरूरी होता है समझा जाना।
जर्मन, फ़्रेंच और भारतीय नामों का टकराव

विदेशी भाषाएं पढ़ाने वाले शिक्षक रोज इस तरह की दिलचस्प स्थितियां देखते हैं। जर्मन भाषा पढ़ाने वाले तन्मय तगारे बताते हैं कि भारत में जर्मन खाने के नाम पढ़ाना अपने आप में एक अनुभव है।

मशहूर ऑस्ट्रियन केक साखरटॉर्टे छात्रों को मराठी के ‘साखर’ से जोड़ देता है। ‘मुस्काटनुस’ सुनकर कुछ छात्रों को थप्पड़ वाला शब्द याद आ जाता है, और ‘वांगे’ सुनते ही बैंगन पर ठहाके लग जाते हैं। ये गलतियां कक्षा को हल्का बनाती हैं और भाषा को डर की जगह दोस्त बना देती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि गलत उच्चारण केवल विदेशी खाने तक सीमित नहीं है। भारत के भीतर ही क्षेत्रीय व्यंजन जब दूसरी भाषाओं के इलाक़ों में पहुंचते हैं, तो उनके नाम भी बदल जाते हैं। ‘नेन्जेलुंबु रसम’ आराम से ‘निंजा रसम’ बन जाता है और ‘केमीन उलर्थियाथु’ को लेकर लोग अंदाज़े ही लगाते रह जाते हैं।
डोसा या दोशा: उच्चारण की बहस

डोसा को लेकर ‘दो-सा’ या ‘दो-शा’ की बहस आज भी जारी है। बेंगलुरु की होम शेफ श्रुति महाजन मानती हैं कि ये बहसें खाने जितनी ही दिलचस्प होती हैं, क्योंकि हर उच्चारण के पीछे एक इतिहास और पहचान छुपी होती है।

यह आदान‑प्रदान एकतरफा नहीं है। विदेशी लोग भी भारतीय खाने के नामों के साथ जूझते हैं। फ्रांस से आई एडेलिन लान्स बताती हैं कि उन्होंने लंबे समय तक ‘संदेश’ को ‘सैंडविच’ कहा, जब तक कि किसी सहकर्मी ने प्यार से सुधार नहीं दिया। ‘क्रोइसां‑प्रशांत’ वाले पूरे मजाक ने उन्हें इसलिए भी हंसाया क्योंकि उनके दोस्त फ्रांस में कैफे जाकर जानबूझकर ‘प्रशांत’ मांग रहे थे। यह मज़ाक नहीं, बल्कि भारतीय खाने और संस्कृति के प्रति उत्सुकता का इज़हार था।

शायद यही वजह है कि ‘प्रशांत’ इतना बड़ा पल बन गया। यह फ़्रेंच भाषा की हार नहीं थी, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीत थी। यहाँ शब्द पत्थर की लकीर नहीं होते। वे चलते हैं, बदलते हैं और लोगों के साथ घुलते‑मिलते हैं।
like (0)
cy520520Forum Veteran

Post a reply

loginto write comments
cy520520

He hasn't introduced himself yet.

510K

Threads

0

Posts

1510K

Credits

Forum Veteran

Credits
157954