नवंबर से अप्रैल के बीच होता है बाघों का प्रजनन काल. File Photo
ललित मोहन बेलवाल, हल्द्वानी। प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष गहराता जा रहा है। ताजा प्रकरण रामनगर डिवीजन की फतेहपुर रेंज का है, जहां गुरुवार को बाघ ने जंगल में घास काटने गई महिला को शिकार बनाया। अहम बात यह है कि यह बाघों के प्रजनन काल का समय होता है। ऐसे में वे अधिक आक्रामक रहते हैं और अपने दायरे में आने वालों पर हमला करते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि नवंबर से अप्रैल के बीच बाघों का प्रजनन काल माना जाता है। इस दौरान उनके हार्मोन में बदलाव होते हैं, जिससे उनके स्वभाव में परिवर्तन आता है। इस पर नवंबर से फरवरी के बीच का समय अत्यधिक संवेदनशील माना जाता है।
प्रजनन काल में अधिक हमलावर
इस दौरान सर्दी के चलते लोगों को लकड़ी की अधिक जरूरत होती है। इसलिए उनकी जंगल में आवाजाही बढ़ जाती है। इस पर घास के लिए भी महिलाएं जंगल जाती हैं। ऐसे में बाघ से आमना-सामना होने का खतरा बढ़ जाता है। बाघ स्वभाव से आक्रामक होते हैं और शिकार की तलाश में घात लगाकर बैठे रहते हैं। इस पर प्रजनन काल में वे अधिक हमलावर हो जाते हैं। ऐसे में कोई बाघ के दायरे में आता है तो वह उस पर हमला कर देता है।
प्रदेश में बीते 25 वर्षों में मानव वन्यजीव संघर्ष में 1200 से अधिक मौतें हुई हैं, जिनमें बाघ के हमलों में 100 से अधिक लोगों की जान गई है और 130 से अधिक घायल हुए हैं। हल्द्वानी से लेकर कार्बेट टाइगर रिजर्व क्षेत्र की बात करें तो पिछले 16 वर्षों में 45 लोगों की बाघ के हमले में मौत हुई है। इनमें शीतकाल में 31 लोगों की मौत हुई है, जब बाघों का प्रजनन काल चलता है। इसी तरह जनवरी 2025 से अब तक हल्द्वानी से कार्बेट तक बाघ के हमलों में आठ मौतें हुईं जिनमें से सात हमले प्रजनन काल के दौरान ही हुए।
हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर भी जोर देते हैं कि प्रजनन काल की आक्रामकता बाघों के बढ़ते हमलों की एक वजह है। इसके अतिरिक्त पलायन के चलते गांवों के पास झाड़ियां उग आई हैं, जिस कारण वन्यजीवों को छिपने की जगह मिल जाती है। इसी तरह कई बार जंगल में जब शिकार नहीं मिल पाता है तो भी वन्यजीव आबादी की तरफ पशुओं पर हमला करने आते हैं। ऐसे में बाघ के रास्ते में अगर कोई आता है तो वह उस पर हमला कर देते हैं।
घसियारी योजना के तहत खरीदें चारा, जान जोखिम में डालकर जंगल न जाएं
प्रमुख वन संरक्षक और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक रंजन कुमार मिश्र ने बताया कि बार-बार लोगों से अपील की जाती है कि प्रजनन काल के दौरान जंगल में न जाएं। इस समय बाघ को किसी भी तरह का व्यवधान पसंद नहीं आता है। ऐेसे में एक ही जगह पर बाघ और बाघिन दोनों के हमले का खतरा रहता है। प्रदेश सरकार मुख्यमंत्री घसियारी कल्याण योजना के तहत पशुपालकों को बेहद सस्ती दर पर चारा उपलब्ध करा रही है। लोगों को वहां से चारा लेना चाहिए और अपनी जान जोखिम में डालकर जंगल में नहीं जाना चाहिए।
यह भी पढ़ें- कोबरा की फुंफकार के आगे \“ढेर\“ हुआ बाघ का टशन, जान बचाकर भागते दिखे टाइगर; देखें दुर्लभ नजारा
यह भी पढ़ें- हल्द्वानी में बाघ का खौफ: बहू के सामने सास को उठा ले गया टाइगर, क्षत-विक्षत शव मिला
यह भी पढ़ें- देहरादून में घर के आंगन से पालतू डॉगी को उठा ले गया गुलदार, CCTV में कैद हुआ पूरा मंजर |