जयराम व शंकरावती देवी l सौ. स्वजन
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। रोशनी की उम्मीद लेकर न्यू राजेश हाईटेक अस्पताल, जद्दूपट्टी, सिकरीगंज में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने पहुंचे मरीजों के लिए इलाज त्रासदी में बदल गया है। 19 मरीजों की आंख संक्रमित हो गई है। इनमें से आठ लोगों की आंख की रोशनी जा चुकी है। एम्स दिल्ली में अलग-अलग दिनों में अब तक 17 रोगी पहुंचे। इनमें से रहदौली की शंकरावती देवी की आंख निकालकर कृत्रिम आंख लगा दी गई है। वह गुरुवार को घर लौट आईं।
एम्स दिल्ली में देवराजी देवी, मीरा देवी, अर्जुन सिंह, रामदरश, रमावती, कैलाशी, रामसरन व बुद्धिसागर भर्ती हैं। इनमें से देवराजी, मीरा, अर्जुन, रामसरन व रामदरश की आंख की रोशनी जा चुकी है। डाक्टर संक्रमण कम करने की कोशिश कर रहे हैं। आठ रोगी अपने रिश्तेदारों के यहां रहकर समय-समय पर ओपीडी में जाकर उपचार करा रहे हैं। रंजीत व जयराम को एम्स गोरखपुर में भर्ती कराया गया है। उनकी आंखों की भी रोशनी जा चुकी है।
मोतियाबिंद आपरेशन के बाद फैले गंभीर संक्रमण ने स्वास्थ्य तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल में आपरेशन कराए 30 मरीजों में से 19 की आंखों में संक्रमण की पुष्टि हुई है, जबकि आठ मरीज अपनी दृष्टि गंवा चुके हैं। इतने गंभीर घटनाक्रम के बावजूद अब तक अस्पताल प्रबंधन या संबंधित चिकित्सक पर कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है।
फिलहाल केवल ऑपरेशन थिएटर (ओटी) को सील किया गया है। जयराम के पुत्र प्रवीन का कहना है कि सर्जरी के बाद कई मरीजों की आंखों में तेज दर्द, सूजन और मवाद आने की शिकायत हुई। कुछ ही दिनों में संक्रमण बढ़ता गया और स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अनेक की आंखों की रोशनी नहीं बचाई जा सकी। इसे लेकर स्वजन में दहशत व आक्रोश है।
मामले के तूल पकड़ने के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) की ओर से जांच समिति गठित की गई। समिति के अध्यक्ष डा. एके चौधरी ने बताया कि विभाग की संवेदना प्रभावित मरीजों के साथ है और पूरी निष्पक्षता से जांच कराई जा रही है। एहतियातन अस्पताल का ऑपरेशन थिएटर सील कर दिया गया है। साथ ही अस्पताल के पंजीकरण संबंधी दस्तावेज, संबंधित चिकित्सक की डिग्री, ओटी टेक्नीशियन की योग्यता, स्टाफ के बयान, आयुष्मान भारत योजना का रजिस्टर और ऑपरेशन में प्रयुक्त इंजेक्शन व दवाओं के नमूने सुरक्षित कर लिए गए हैं।
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जांच रिपोर्ट आने के बाद यदि लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसमें अस्पताल का लाइसेंस निलंबित या निरस्त करना भी शामिल हो सकता है। अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सक के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने के लिए किसी पीड़ित की लिखित शिकायत आवश्यक है, जबकि अब तक किसी भी मरीज ने औपचारिक शिकायत नहीं की है।
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