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भारत के पास सबसे सस्ती हरित ऊर्जा- फिर चिंता क्यों?

deltin55 1 hour(s) ago views 2
       
       







बिजली के क्षेत्र में भारत दशकों तक उत्पादन की कमी और उचित दाम की समस्याओं से जूझता रहा. हालांकि, इस दौरान विद्युत क्षेत्र में कुछ जटिल और महत्वाकांक्षी सुधार भी हुए. आज, हम हर साल 40 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ते हैं जो ज़्यादातर विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक है, और सस्ती भी. अब लक्ष्य है बाज़ारों, संस्थानों और मांग को व्यवस्थित करना. लगभग 42 गीगावाट नवीकरणीय क्षमता नीलामी के जरिए निर्धारित होने के बावजूद खरीदार उपयोगिताओं को नहीं मिल पाई है जिसके कारण अवशोषण एक चुनौती बन रहा है. वितरण कंपनियां अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा प्रतिबद्धताओं के प्रति सतर्क हैं. ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा की गति बनाए रखने के लिए, खरीदारों की संख्या बढ़ानी होगी. दो संरचनात्मक बदलावों से यह संभव हो सकता है.



पहला कारण, अक्षय ऊर्जा की कीमतों में गिरावट है. हाल की रिवर्स नीलामी में सौर ऊर्जा और स्टोरेज लगभग 3 रुपये प्रति यूनिट पर बंद हुई हैं. ये कीमतें 12 से 25 साल तक नाममात्र रूप में स्थिर रहीं हैं. यह परियोजनाएं चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति इसी कीमत पर दे सकती हैं. दूसरा कारक संस्थागत सुधार का परिणाम है. ओपन एक्सेस और कैप्टिव खरीद से बड़े औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ता सिर्फ नेटवर्क फीस का भुगतान करके पूरे देश में कहीं से भी बिजली खरीद सकते हैं. भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वृद्धि का लगभग एक चौथाई हिस्सा अब इससे संचालित होता है. यह बदलाव उपयोगिताओं को मज़बूत ग्रिड और विश्वसनीयता प्लेटफॉर्म्स में विकसित होने की अनुमति देगा जबकि नई मांग कम लागत वाली स्वच्छ ऊर्जा की खपत करेगी. अब सवाल है कि नई मांग कहां से आएगी?



पहले, औद्योगिक उत्पादन केंद्र, निर्यात-उन्मुख उद्योग और डेटा सेंटर ओपन एक्सेस या कैप्टिव रास्तों के माध्यम से स्वच्छ बिजली प्राप्त कर सकते हैं. इससे दीर्घकालिक लागत प्राप्ति की निश्चितता मिलती है और बड़ी मात्रा में नई क्षमता को समायोजित किया जा सकता है. ऐसे क्लस्टर्स, जो यूरोपियन यूनियन के कार्बन बॉर्डर एडस्टमेंट मैकेनिज़्म (सीबीएएम) के तहत भारतीय निर्यात को बढ़त प्रदान करते हैं. दूसरा, भारत की औद्योगिक ऊर्जा मांग का लगभग आधा हिस्सा हीट प्रोसेसिंग के लिए है, जिसमें बड़ी मात्रा आयातित तेल और गैस से आती है. इलेक्ट्रिक हीट पंप और उच्च तापमान हीट बैटरी इस मांग को स्वच्छ ऊर्जा की तरफ स्थानांतरित करने की सुविधा देते हैं.


तीसरा, उर्वरक और इस्पात महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं लेकिन ये भी आयातित गैस और कोकिंग कोयले पर निर्भर हैं. हाल में हुई हरित अमोनिया नीलामी से पता चलता है कि स्वच्छ बिजली का इस्तेमाल करके उर्वरक उत्पादन में लागत कम आती है. लागत में लगातार गिरावट के साथ, हरित इस्पात एक समान मार्ग अपना सकता है. चौथा, बसों, ट्रकों या मालवाहक बेड़ों का विद्युतीकरण घरेलू स्वच्छ ऊर्जा के लिए एक बड़ा और लचीला मांग स्रोत पैदा कर सकता है. जब चार्जिंग दिन के समय सौर उत्पादन के अनुरूप होती है, तो बिजली की मांग तब बढ़ती है जब साफ़ ऊर्जा सबसे अधिक उपलब्ध होती है. पांचवां, वाणिज्यिक भवनों, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) और घरों की छतों पर लगे सौर ऊर्जा के बिलों को कम करता है. इससे बिजली का नुकसान और सब्सिडी का बोझ कम होता है. 



अगर दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा अनुबंधों को समर्पित वित्तीय मंच और तंत्र के माध्यम से सुरक्षित किया जाए, तो बड़े खरीदार तेज़ी से आ सकते हैं. वहीं छोटे उपभोक्ताओं के लिए लेन-देन आसान बनाने के लिए इंडिया स्टैक से जुड़े फिनटेक उत्पादों की ज़रूरत होगी. स्वच्छ बिजली की बढ़ती मांग भारत की अत्यधिक सौर पैनल निर्माण क्षमता की खपत करने का सबसे प्रभावी तरीका भी है. हालांकि, एक चिंता की बात ये है कि सौर पैनल का मुख्य घटक, विशेष रूप से बैटरी, अक्सर आयातित होते हैं. भारत ने सौर ऊर्जा निर्माण के माध्यम से दिखाया है कि ऐसी निर्भरताओं को पैमाने और नीतिगत निश्चितता के साथ कम किया जा सकता है. बैटरियां भी इसी तरह की राह पर चल सकती हैं. महत्वपूर्ण खनिजों को सुरक्षित करने के लिए सहयोगी अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी के माध्यम से बैटरी उत्पादन किया जा सकता है.




मज़बूत घरेलू मांग हमेशा भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत रही है. अब स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बदलाव में भी यह काम आ सकती है. भारत की सबसे सस्ती बिजली आ चुकी है. अगर बाज़ार और संस्थान इसका सही उपयोग करें तो यह विकसित भारत की यात्रा को परिभाषित करेगा.


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