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देखते-देखते कितनी बदल गई छठ!

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चंद्रभूषण-





लगभग सारे ही हिंदू त्यौहारों को मैंने अपने सामने जड़-मूल से बदलते देखा है और छठ का पर्व इस सूची में काफी ऊपर है। यह बदलाव सकारात्मक है या नकारात्मक, इस बारे में मेरी मित्रमंडली की राय बंटी हुई है सो अपनी तरफ से कुछ नहीं कहूंगा। सिर्फ अपने तजुर्बे बयान करूंगा। सबसे पहले छठ से मेरा साबका 1988 में पड़ा था। पटना में वह मेरा पहला साल था और दिनचर्या ज्यादातर ‘जनमत’ डेरे में रहकर पढ़ते-लिखते रहने की ही थी। उस साल की छठ में सड़कों पर डूबते सूरज की अर्घ्य का जलवा मैं नहीं देख पाया लेकिन सुबह की अर्घ्य देखने विष्णु राजगढ़िया और इरफान के साथ मैं भी राजेंद्र नगर सेक्टर-5 से साइंस कॉलेज के पीछे वाले गंगाघाट की तरफ गया।





भीड़ इतनी ज्यादा थी कि घाट तक पहुंचने की नौबत नहीं आई लेकिन मारामारी जैसी हालत भी नहीं थी। लोग सड़क के दोनों ओर खड़े थे, हम भी उनके बीच जा लगे। बरतिनी लोग और उनकी सेवा में लगे परिजन घाट से लौट रहे थे और ठेकुआ का प्रसाद किनारे खड़े लोगों को बांट रहे थे। हम तीनों भी घंटे भर में तृप्त होकर लौटे और सुबह की यह आजाद स्पिरिट देर तक बनाए रखने के लिए दोपहर तक जिधर-तिधर टहलते रहे। वह समय बिहार में हर साल मुख्यमंत्री बदलने का था। तीन तो 88-89 में ही बदल चुके थे- भागवत झा आजाद, सत्येंद्र नारायण सिंह और जगन्नाथ मिश्र। पटना शहर का दक्षिणी इलाका बारिशों में नरक बन जाता था और सरकारें इससे निर्लिप्त ही लगती थीं। लेकिन छठ के मौके पर गंगाघाट लोगों की निजी कोशिशों से चमकते थे और दुर्घटनाएं नहीं सुनाई पड़ती थीं।





पूरे बिहार में तब छठ मनाई जाती थी या नहीं, पक्के तौर पर मैं नहीं कह सकता लेकिन बिहार से बाहर विरले लोग ही इससे परिचित थे। मेरा अपना जिला आजमगढ़ बिहार से ज्यादा दूर नहीं है लेकिन पटना पहुंचने से पहले मैंने इसका नाम भी नहीं सुना था। स्त्रियां मेरे गांव में भी दो-तीन कठिन व्रत रखती थीं- जिउतिया, गणेश चौथ और बारिश के मौसम में आने वाली एक ललही छठ। ये लगभग चौबीस घंटे के निर्जल व्रत हुआ करते थे, लेकिन बिहार की छठ में इस व्रत की अवधि छत्तीस घंटे हो जाती थी। ऐसा हठ गांव-टोले के साझा उत्साह के बिना नहीं निभाया जा सकता।





रही बात अभी की तरह इस उत्साह के बरजोरी आस्था प्रदर्शन और अंतहीन पटाखेबाजी में स्खलित होने की, तो यही वह बदलाव है, जिसका जिक्र मैं यहां करना चाहता हूं। ध्यान आता है, 1989 के आम चुनाव के लिए पटना से आरा जाने के रास्ते में ट्रेन के कोइलवर ब्रिज पर फंस जाने का। मैंने सोचा भी नहीं था कि आज डूबते सूरज को अर्घ्य देने का दिन है और मेरी ट्रेन शाम के ही वक्त सोन नदी पार कर रही होगी। कई घंटे गाड़ी उस पुल पर रुकी रही। थोड़ी देर मैं खीझता रहा, फिर खिड़की से बाहर झांकते हुए छठ का आनंद लेने लगा। एक स्थानीय पर्व में आस्था के साथ थोड़ा छिछोरापन भी जुड़ा होता है। उस समय बाहर लाउडस्पीकर पर बजता हुआ एक चिरकुट मगही गाना दिमाग पर ऐसा चढ़ा कि इस जन्म में उतरने वाला नहीं है- ‘चल रे छौंड़ी गंगा नहाए तोरा के छौंड़ा बोलवले बाय…।’





गाने से ध्यान आया कि शारदा सिन्हा के गाए गीत पहली बार मैंने पटना में ही सुने, छठ के ही मौके पर। और ये मगही, भोजपुरी और मैथिली, तीनों ही भाषाओं में थे, अलग-अलग आकर्षक धुनों में। अपनी मातृभाषा भोजपुरी के अनुसार फिलहाल एक ही जुबान पर आ रहा है- ‘केरवा के पात पर उगेलन सुरुज मल झांके उनके…।’ इससे एक बात तो तय हो जाती है कि तब के बिहार में आदिवासी समाज को छोड़कर सारे ही समुदाय यह पर्व मना रहे थे। खैर, शारदा जी के जीवन में यह बड़ा मोड़ था। 1989 में ही राजश्री प्रॉडक्शंस की फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ में उनका गाना ‘कहे तोंसे सजनी तुमरी सजनियां, पग-पग लिए जाऊं तुमरी बलइयां’ आया और वे देश भर में सुनी जाने लगीं।





बहरहाल, छठ के दायरे में असली उछाल दिखा 1990 से, जब मुख्यमंत्री लालू यादव प्रतीक रूप में फलों का दौरा सिर पर लिए घाट पर पहुंचे और उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने वहां चांदी के सूप में रखकर फल और मिठाइयां शाम के अर्घ्य में सूरज भगवान को समर्पित कीं। बिहार के वीवीआईपी परिवारों में छठ पहले भी होती रही होगी, लेकिन एक मुख्यमंत्री के सपत्नीक घाट पर छठ मनाने की अखबारी सूचना मुझे इस राज्य में अपनी तीसरी छठ के मौके पर ही मिली। इसके बाद से छठ की छवि एक झटके में बिहार के राष्ट्रीय पर्व जैसी हो गई, लेकिन इसकी कई वजहें थीं।





सबसे बड़ी बात यह कि महानगरों में अकारण गालियां सुन रहे बिहारियों ने लालू यादव के साथ अपनी पहचान जोड़ ली। बता दूं कि 1996 तक मैं एक राजनीतिक कार्यकर्ता था और मेरे भोजपुरी लहजे से, या शायद कुछ समय बिहार में बिताने के चलते दिल्ली में मेरे प्रति नाराजगी जताने के लिए कुछ लोग मुझे भी बिहारी ही कहते थे। मेरे लिए यह न गर्व का विषय था न शर्म का, लेकिन लक्ष्मीनगर में दिल्ली मिल्क स्कीम के एक बूथ पर पहली बार मुझे लगा कि मुझे बिहारी कह रहा व्यक्ति असल में मुझे गाली दे रहा है। ‘बिहारी’ बोलकर लोगों को अपमानित करने की उस दौर में दो घटनाएं मुझे याद आती हैं। दोनों का संबंध दिल्ली से ही है और दोनों खबरों में रहीं।







एक तो अशोक विहार में बच्चों के खुले में लैट्रिन करने को लेकर पुलिस की चलाई गोली से दो लोगों की मौत। साथ में किसी स्थानीय नेता का बयान कि बिहार के लोग जहां भी रहते हैं, ऐसे ही गंदगी मचाए रहते हैं। दूसरी घटना पुलिस कमिश्नर आमोद कंठ से जुड़ी थी, जो तब पूर्वी दिल्ली में किसी जिले के प्रभारी थे। वे किसी थाने के दौरे पर थे, जिसके परिसर में कुछ मलबा पड़ा था। उन्होंने थानेदार से मलबा हटवाने के लिए कहा तो उसने अपने मातहत को बाहर से ‘चार बिहारी’ पकड़ लाने को बोल दिया। आमोद कंठ ने कहा, तीन ही लाना क्योंकि चौथा तो मैं यहां हूं ही। बाद में क्षेत्रीय संवेदना को लेकर दिल्ली पुलिस की स्थिति को लेकर यह किस्सा उन्होंने कई मौकों पर सुनाया।





नब्बे के ही दशक में, बतौर मुख्यमंत्री लालू यादव के पहले कार्यकाल में कभी समुद्र में छठ करने को लेकर शिवसेना से तो कभी यमुना में छठ करने को लेकर दिल्ली के किसी लोकल नेता से छोटे-मोटे टकराव हुए और इस क्रम में छठ बिहार की अस्मिता के प्रतीक पर्व की तरह उभर आया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रचार चक्की तब भी लालू यादव के खिलाफ चल रही थी लेकिन बिहार की क्षेत्रीय अस्मिता के साथ उनका जुड़ाव इतना सघन था कि इस चक्की के दांत बुरी तरह घिसे हुए जान पड़ते थे। इनमें जान तब लौटी, जब लालू यादव चारा घोटाले में फंस गए और उनकी मजाकिया जमीनी छवि जनसंहार की घटनाओं, अपहरणों और दबंगई की वारदातों से बदरंग होने लगी।





अभी तो हालत यह है कि छठ पर खुद को ज्यादा से ज्यादा ‘पूर्वांचली-हितैषी’ दिखाने के फेरे में जनता से कहीं ज्यादा अफरा-तफरी राजनीतिक दल मचाए रहते हैं। देश के तकरीबन हर महानगर के हर मोहल्ले में महत्वाकांक्षी छुटभैया नेता बेमतलब घुड़दौड़ में उतर जाते हैं। वे चाहे सरकार में हों या विपक्ष में, छठ से उनका लगाव लोगों को घाट पहुंचाने तक ही सीमित रहता है। पूजा के बाद घाटों की सफाई भी एक काम है, यह न करने पर लोगों के मुंह से गालियां निकलती हैं, इसपर वे सोचना भी जरूरी नहीं समझते। सामूहिकता से सराबोर इस स्थानीय पर्व को ‘डल झील में छठ मनाने’ की दबंगई से जोड़ना इसे कहां ले जा रहा है? मेरे लिए उस भाप छोड़ती सुबह को याद करना कठिन होता जा रहा है, जब मैं, विष्णु और इरफान पटना में यूनिवर्सिटी रोड पर छठ के ठेकुए की कतार में खड़े थे।








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