सुभाष सिंह सुमन-
तो भैया, कार से लेकर बार तक, सब खुश हो जाओ। जो काम मनमोहन सिंह नहीं कर पाये, मोदीजी भी नहीं कर पा रहे थे, ट्रंप चचा की कृपा से ऐसे हो गया, जैसे कोई बड़ा काम ही नहीं था। लेकिन भारत-यूरोप ट्रेड डील वास्तव में बहुत बड़ा काम हुआ है। 18 साल से बात ही हो रही थी, लेकिन बात बन नहीं रही थी। चचा के टैरिफ वाले तमाशे ने बात बनने में 18 महीने नहीं लगने दिये।
भारत की सबसे बड़ी ताकत है विशाल आबादी। डेढ़ अरब पेट का बाजार है भारत। इसमें भी खास बात है कि बड़ा हिस्सा कामकाज करने में सक्षम लोगों का है। ऐसे में कोई मूर्ख ही होगा, जो इस बाजार में हिस्सा पाने के लिए प्रयास नहीं करेगा। अभी तो ट्रंप चचा के रूप में इस मूर्खता को चेहरा मिला हुआ है।
तो ट्रंप चचा ने पहले भारत से बिगाड़ किया। फिर यूरोप से भी बिगाड़ कर लिया। जबकि अमेरिका पिछले दो-ढाई दशकों से भारत और यूरोप के बीच पुल जैसा बना हुआ था। यूरोप की भारत के प्रति आर्थिक नीतियाँ अमेरिका के रास्ते तय होती थीं। ट्रंप चचा ने दो पुल तोड़े। एक भारत के साथ, एक यूरोप के साथ। तो भारत और यूरोप ने नया पुल बना लिया। डील को सबसे कम शब्दों में इस तरह समझा जा सकता है।
डील कितनी बड़ी है, उसे भारत सरकार के आधिकारिक वर्जन से भी समझा जा सकता है। पीएम मोदी बता रहे हैं- इस डील में वैश्विक अर्थव्यवस्था का 25% और वैश्विक व्यापार का 33-34% कवर हो रहा है।
डील भारत और यूरोप दोनों के लिए फायदेमंद है। यूरोप को भी बाजार मिलेगा। भारत को भी बाजार मिलेगा। कौन कितना लाभ उठा पायेगा, यह निर्भर करेगा दोनों पक्षों की कंपनियों के ऊपर। जैसे चीन अभी यूरोप की जरूरत के कई सामान बना रहा है, हम भी बना सकते हैं। इस डील से बढ़िया रास्ता खुल रहा है।
ट्रंप चचा के टैरिफ से भारत के कुछ सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे थे। जैसे- रत्न-आभूषण, कपड़े, जूते-चप्पल जैसे चमड़े के सामान, रबर, केमिकल वगैरह। ये सारे सेक्टर श्रम प्रधान कहे जाते हैं। मतलब कि इन सभी क्षेत्रों की कंपनियों में बहुत ज्यादा काम इंसान कर रहे हैं, मशीन नहीं। स्वाभाविक है इनमें बड़े पैमाने पर लोगों को काम मिलता है। ट्रंप टैरिफ ने इसे प्रभावित किया है। यूरोप के बाजार इन क्षेत्रों की कंपनियों को ट्रंप टैरिफ से हुए नुकसान की न सिर्फ भरपाई कर सकते हैं, बल्कि और काम दे सकते हैं।
मेरे जैसे लोगों के लिए भी इस डील में चीजें हैं। मैं 2025 शुरू होने के साथ उम्मीद में बैठा था कि अमेरिका से डील होगी, हर्ले डेविडसन पर टैक्स कम होगा, जीप-फोर्ड नये मॉडल लेकर आयेंगे। डील अभी तक अटकी हुई है। इसकी भरपाई यूरोप वाली डील से हो सकती है। अभी यूरोप से आने वाले वाहनों पर 70% से 110% टैक्स लग रहा है। इसे अगले 5 साल में धीरे-धीरे घटाकर 10% किया जायेगा। पार्ट्स पर टैक्स आधा हो गया है। अभी लग रहा है 16.50%। अब लगेगा 8.25%। मतलब फॉक्सवैगन, स्कोडा, ऑडी, बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज, स्टेलांटिस वगैरह के लिए बढ़िया चीज हुई। इन्हें मिलेगा दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार बाजार। हमें मिलेंगी बढ़िया मशीनें, जिसका रोना मेरे जैसा मशीन प्रेमी हमेशा रोते आया है।

टाटा, महिंद्रा, मारुति को नुकसान अधिक होने जा रहा है, नफा कम। इन्हें यूरोप के बाजार में कम टैक्स का फायदा मिलेगा, लेकिन यूरोप का कार बाजार बहुत टफ है। लगभग संतृप्त बाजार है। यूरोप को छोटी कारें पसंद हैं। यूरोप की कंपनियाँ छोटे पैकेट में बड़ा इंजन डालने में माहिर हैं। तो हमारी इन तीनों कंपनियों को वहाँ बहुत मौके मिलेंगे, इसकी मुझे कम उम्मीद लगती है। हाँ, यहाँ बहुत नुकसान जरूर हो सकता है। भारतीय बाजार में 20-25 लाख तक के सेगमेंट में 80-85% पर इन तीनों का कब्जा है। टैक्स कम होने से खासकर फॉक्सवैगन को भारत में नये मॉडल लाने में सुविधा होगी। सेडान में अकेले एक वर्टस ने सबको पानी पिला रखा है 3-4 साल में ही। अब 20-25 लाख से नीचे कई शानदार कारें आ सकती हैं। और ये सभी कारें टाटा, महिंद्रा और मारुति का ही बाजार खायेंगी।
अब रसप्रेमी जनता के मुद्दे की बात। यूरोप जिन चीजों के लिए प्रसिद्ध है, उनमें एक चीज है वाइन। अभी भारत में इनके ऊपर टैक्स है 150%। यह तुरंत होने वाला है 75%। धीरे-धीरे इसे किया जायेगा 20%। स्पिरिट वालों को भी निराश नहीं होना है। टैक्स इधर भी कम हो रहा है। 150% से 40%। बीयर पर 110% से 50%। मतलब सबकी मौज।
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