मनोज मलयानिल-
19 जनवरी 1990… के ही दिन आधुनिक इतिहास के सबसे तेज, सबसे क्रूर और सबसे सफल जातीय-धार्मिक सफाये (Ethnic Cleansing) की शुरुआत हुई थी।
इसी दिन कश्मीर घाटी में इस्लामिक चरमपंथियों ने मूल निवासी हिंदू अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों को घाटी से बाहर निकालने का सुनियोजित अभियान शुरू किया था। सुन्नी मुस्लिम बहुल इलाकों में मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से खुलेआम ऐलान हुआ कि कश्मीरी पंडित 24 घंटे के भीतर घाटी छोड़ दें।
इसके बाद जो हुआ वह केवल पलायन नहीं था। वह डर, हत्या, बलात्कार और आतंक का ऐसा संगठित प्रयोग था जिसने हजारों कश्मीरी पंडित परिवारों को रातों-रात शरणार्थी बना दिया। बड़ी संख्या में पंडितों की हत्या की गई और अनगिनत महिलाओं के साथ अत्याचार हुआ। यह महज सांप्रदायिक हिंसा नहीं, यह एक ‘कामयाब’ एथनिक क्लीनजिंग थी।
उस दौर में आज की तरह 24×7 प्राइवेट न्यूज़ चैनल नहीं थे। सोशल मीडिया तो दूर, सूचनाओं के प्रवाह की सीमाएं थीं। आम लोगों तक वही खबरें पहुँचती थीं जो सरकार रेडियो और दूरदर्शन के जरिये देती थी। ऐसे समय में बीबीसी रेडियो हिन्दी सेवा भारत में सबसे भरोसेमंद और लोकप्रिय समाचार सेवा मानी जाती थी। बीबीसी लंदन में लगभग दो दशक तक काम कर चुके वरिष्ठ ब्रॉडकास्टर विजय राणा ने कुछ वर्ष पहले सोशल मीडिया पर स्वीकार किया था कि बीबीसी हिन्दी ने कश्मीर में हुई इस भीषण जातीय-धार्मिक सफ़ाये की घटना पर कोई रिपोर्ट प्रसारित नहीं की थी।
बीबीसी की यह चुप्पी सिर्फ एक संपादकीय निर्णय नहीं थी। यह चुप्पी उन हजारों पीड़ितों के लिए दूसरी सजा बन गई जिनकी आवाज पहले घाटी में दबाई गई और फिर वैश्विक मीडिया में भी गायब कर दी गई।
आज जब बीबीसी की डिजिटल सेवाएँ भारत में फिर से बड़े पैमाने पर पढ़ी और देखी जाती हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पत्रकारिता का अर्थ सिर्फ सच बताना है या यह भी तय करना कि कौन-सा सच दिखेगा और कौन सा नहीं?
अगर बोस्निया, रवांडा या रोहिंग्या अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियाँ बन सकते हैं तो कश्मीरी पंडितों का नरसंहार क्यों नहीं? अगर मानवाधिकार पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है तो कश्मीर में उनका अपवाद क्यों बनाया गया?

कश्मीर से निकाले गए पंडित आज भी अपने घरों की चाबियाँ संभालकर बैठे हैं। उनकी यादें जिंदा हैं, उनका जख्म अब भी हरा है… पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की याद्दाश्त अब भी सलेक्टिव बनी हुई है।
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