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अमित तिवारी,
मेरठ। मेरठ छावनी के भीतर शोर और सुर्खियों से दूर एक ऐसा संस्थान कार्यरत है, जहां साहस को जन्म दिया जाता है, अनुशासन को संस्कारित किया जाता है और निष्ठा को सैन्य कौशल में ढाला जाता है। रिमाउंट वेटरनरी कोर (आरवीसी) सेंटर एंड कालेज की डाग ट्रेनिंग फैकल्टी (डीटीएफ) आज भारतीय सेना की सैन्य श्वान क्षमता की रीढ़ बन चुकी है। यही वह स्थान है, जहां भारतीय सेना के प्रसिद्ध ‘साइलेंट केनाइन वारियर्स’ तैयार होते हैं। कई दशकों तक प्रशिक्षण का फोकस आयातित नस्लों तक सीमित रहा। अब मेक इन इंडिया, वोकल फार लोकल और आत्मनिर्भर भारत जैसी राष्ट्रीय पहलों की भावना के अनुरूप भारतीय नस्लों को भी सैन्य सेवा में स्थापित किया जा रहा है। यहां तैयार होने वाले फौजी श्वान केवल सहायक नहीं, बल्कि रणनीतिक संसाधन हैं, जिनकी तैनाती से सीमा सुरक्षा, आतंक रोधी अभियान और आंतरिक सुरक्षा में निर्णायक बढ़त मिलती है। गणतंत्र दिवस पर पहली बार स्वदेशी नस्लों के फौजी श्वानों की टुकड़ी का परेड में शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि आत्मनिर्भर भारत की रक्षा व्यवस्था अब विदेशी निर्भरता से आगे बढ़कर भारतीय परिस्थितियों में विकसित सैन्य क्षमताओं पर आधारित हो रही है। पहली बार भारतीय सेना के 10 स्वदेशी नस्ल के फौजी श्वानों का एक विशेष दस्ता इस बार गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेगा। इस दस्ते में मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बाई और राजापलायम जैसी विशुद्ध भारतीय नस्लें शामिल होंगी। यह क्षण न केवल आरवीसी के लिए, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में देश की सशक्त प्रगति का भी प्रतीक होगा। इन स्वदेशी भारतीय नस्लों को सुरक्षा के लिए विकसित किया गया है। ये तेज, मजबूत, साहसी, कम रखरखाव वाले, गर्मी सहने वाले, सहनशील, बुद्धिमान और अपने मालिक यानी हैंडलर के प्रति अत्यंत वफादार होते हैं। इससे पहले यह दस्ता 15 जनवरी को राजस्थान के जयपुर में आयोजित सेना दिवस परेड में हिस्सा ले चुका है। आरवीसी के फौजी श्वानों का दस्ता पहले भी गणतंत्र दिवस परेड में हिस्सा ले चुका है लेकिन स्वदेशी नस्ल के श्वानों का दस्ता पहली बार हिस्सा लेगा। आरवीसी की डाग ट्रेनिंग फैकल्टी केवल एक प्रशिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि उन मूक योद्धाओं की जन्मभूमि है जो बिना बोले देश की रक्षा करते हैं। स्वदेशी नस्लों को सैन्य सेवा में स्थान देकर भारतीय सेना न केवल अपनी परिचालन क्षमता बढ़ा रही है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को भी साकार कर रही है। ये श्वान न सुर्खियां मांगते हैं, न पदक, पर हर मिशन में उनकी उपस्थिति राष्ट्र की सुरक्षा की गारंटी बनती है।
स्वतंत्र भारत में शुरू हुई प्रक्रिया स्वतंत्रता के तुरंत बाद वर्ष 1948 में भारतीय सेना ने यह स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि प्रशिक्षित श्वान युद्धक्षेत्र में एक विशिष्ट और निर्णायक बढ़त प्रदान कर सकते हैं। इसी सोच के साथ आर्मी वार डाग स्कूल की स्थापना हुई, जिसे दिसंबर 1959 में आरवीसी सेंटर एंड कालेज में वार डाग ट्रेनिंग स्कूल के रूप में संगठित किया गया। आरंभ में केवल 24 श्वानों की प्रशिक्षण क्षमता वाला यह संस्थान आज एक पूर्ण विकसित सेंटर आफ एक्सीलेंस बन चुका है, जो सिद्धांत निर्माण, प्रशिक्षण मानकीकरण और भारतीय सेना में मिलिट्री वर्किंग डाग्स (एमडब्ल्यूडी) के भविष्य की दिशा तय करता है।
भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विश्वस्तरीय संरचना डीटीएफ का प्रशिक्षण ढांचा विज्ञान, तकनीक और यथार्थपरक फील्ड अनुभव का उत्कृष्ट संयोजन है। डाग ट्रेनिंग फैकल्टी की प्रमुख सुविधाओं में आधुनिक एवं जलवायु-अनुकूल कैनाइन परिसर, वैज्ञानिक डाग ब्रीडिंग सेंटर एवं वंशावली नियंत्रण, नर्सिंग और पप्पी केयर यूनिट, सेंट-कंडीशनिंग एवं डिटेक्शन प्रयोगशालाएं, बाधा अभ्यास क्षेत्र और टैक्टिकल ट्रेनिंग ग्राउंड्स, परिदृश्य-आधारित सिमुलेशन क्षेत्र, उन्नत वेटरनरी हास्पिटल और डायग्नोस्टिक लैब्स, डिजिटल प्रशिक्षण अभिलेख और प्रदर्शन विश्लेषण प्रणाली आदि है। इन सुविधाओं का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में कार्यक्षम मैन और डाग टीम का निर्माण है।
जन्म से युद्धभूमि तक शामिल है एक वैज्ञानिक प्रक्रिया आरवीसी में फौजी श्वान तैयार करने की प्रक्रिया जन्म से पहले ही शुरू हो जाती है। वैज्ञानिक प्रजनन, अल्ट्रासाउंड आधारित गर्भ पुष्टि और नियंत्रित व्हेल्पिंग के माध्यम से स्वस्थ पपीज यानी पिल्लों का जन्म कराया जाता है। जन्म के बाद प्रारंभिक छह सप्ताह पप्पी केयर और सामाजीकरण के लिए समर्पित होते हैं। तीन माह की आयु में प्रत्येक पप्पी अपने जीवन की पहली परीक्षा, पप्पी एप्टीट्यूड टेस्ट (पीएटी) से गुजरता है। यह टेस्ट फौजी श्वान बनने की पहली कसौटी होती है। इस परीक्षण में सूंघने की क्षमता, सुनने और देखने की प्रतिक्रिया, साहस, जिज्ञासा और तनाव सहनशीलता, सामाजिक व्यवहार, अधीनता और अनुशासन को परखा जाता है। इसी आधार पर तय होता है कि श्वान गार्ड डाग, एक्सप्लोसिव डिटेक्शन डाग, माइन डिटेक्टर, असाल्ट डाग, ट्रैकर या सर्च एंड रेस्क्यू डाग बनेगा।
नौ परिचालन विधाएं, एक लक्ष्य सुरक्षा डाग ट्रेनिंग फैकल्टी में श्वानों को नौ विशिष्ट सैन्य भूमिकाओं में प्रशिक्षित किया जाता है। इनमें गार्डिंग और इन्फैंट्री पेट्रोल, विस्फोटक एवं मादक पदार्थ पहचान, माइन डिटेक्शन, ट्रैकिंग और असाल्ट, एवलांच, आपदा राहत और विशेष पहचान कार्य शामिल है। प्रशिक्षण का मूल उद्देश्य उच्च जोखिम और अत्यधिक दबाव वाले वातावरण में भी सटीक, आत्मविश्वासी और अनुशासित प्रदर्शन सुनिश्चित करना है।
विदेशी श्रेष्ठता के साथ स्वदेशी संभावनाएं अब तक भारतीय सेना में मुख्य रूप से विदेशी नस्लें प्रयुक्त होती रही हैं। इनमें गार्ड और पेट्रोल भूमिकाओं की रीढ़ जर्मन शेफर्ड डाग, उत्कृष्ट सूंघने की क्षमता के कारण विस्फोटक पहचान में अग्रणी लैब्राडोर रिट्रीवर, असाल्ट और विशेष अभियानों के लिए अत्यंत प्रभावी बेल्जियन मालिनोइस शामिल थे। लेकिन 2016 से डीटीएफ ने राष्ट्रीय नीतियों के अनुरूप स्वदेशी नस्लों को व्यवस्थित रूप से सैन्य मूल्यांकन में शामिल करना शुरू किया, जो फील्ड ट्रेनिंग में काफी हद तक सफल रहे हैं। स्वदेशी प्रजातियों को विस्फोटक पहचान श्वान (एक्सप्लोसिव डिटेक्शन डाग), गार्ड डाग, असाल्ट डाग और विशेष पहचान कार्यों जैसी भूमिकाओं के लिए परखा गया। इसके साथ ही, स्थानीय स्रोतों से उपलब्धता और रख-रखाव के माध्यम से दीर्घकालिक लाजिस्टिक एवं आर्थिक लाभ प्राप्त करना भी इस पहल का उद्देश्य था।
फील्ड यूनिट में पहुंचे 15 स्वेदशी श्वान अब तक 15 स्वदेशी श्वानों को फील्ड यूनिट्स में जारी किया जा चुका है। इनसे मिले फीडबैक के आधार पर भविष्य की रणनीति तय की जा रही है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलन, आयात पर निर्भरता में कमी और दीर्घकालिक लाजिस्टिक लाभ इस पहल की प्रमुख उपलब्धियां हैं।
सेवा के बाद भी सम्मान एक फौजी श्वान औसतन आठ वर्ष तक सेवा में रहता है। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें डीटीएफ परिसर स्थित ओल्ड एज होम में रखा जाता है। यहां आजीवन चिकित्सा देखभाल और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित किया जाता है।
स्वदेशी फौजी श्वानों की विशेषताएं
मुधोल हाउंड : कर्नाटक के पठारी क्षेत्र और प्रायद्वीपीय भारत के मूल निवासी मुधोल हाउंड्स को स्वदेशी नस्ल में सबसे पहले शामिल किया गया। पतले शरीर, पतली त्वचा, छोटे बाल और साइट-हाउंड विशेषताओं के कारण इन्हें पारंपरिक रूप से शिकार के लिए उपयोग किया जाता रहा है। पहला बैच फरवरी 2016 में तिम्मापुर स्थित कैनाइन रिसर्च एंड इंफार्मेशन सेंटर से प्राप्त किया गया। प्रारंभ में इन्हें गार्ड, ट्रैकिंग और विस्फोटक पहचान भूमिकाओं के लिए प्रशिक्षित किया गया, लेकिन अधिकारियों के बोर्ड ने अंततः इन्हें केवल विस्फोटक पहचान ड्यूटी के लिए ही उपयुक्त माना। इन्हें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य कमांड में तैनात किया गया, परंतु अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों में इनकी कार्यक्षमता सीमित पाई गई। जून 2024 में तीन कुत्तों का दूसरा बैच प्राप्त किया गया है, जिनका विस्फोटक पहचान प्रशिक्षण वर्तमान में जारी है।
चिप्पिपारई : तमिलनाडु की मूल साइट-हाउंड नस्ल चिप्पिपारई अपने शांत, सहनशील स्वभाव और पारंपरिक शिकार भूमिका के लिए जानी जाती है। फरवरी 2020 में चेन्नई के पशुपालन एवं पशु चिकित्सा सेवा विभाग से तीन पिल्ले प्राप्त किए गए। इन श्वान ने कोविड-19 डिटेक्शन डाग्स (सीडीडी) के रूप में उल्लेखनीय सफलता हासिल की और लगभग एक लाख नमूनों में लगभग 97 प्रतिशत सटीकता प्रदर्शित की, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक अभूतपूर्व उपलब्धि रही। इसके बाद इन्हें पुनः प्रशिक्षित कर विस्फोटक पहचान श्वानों के रूप में तैनात किया गया और कुल छह श्वान को आर्मी डाग यूनिट्स को जारी किया गया।
कोम्बाई और राजापालयम : कोम्बाई तमिलनाडु की बहुउद्देश्यीय कार्यशील नस्ल है। पारंपरिक रूप से इस नस्ल के श्वान शिकार व पहरेदारी के लिए उपयोग किए जाते रहे हैं। इनको प्रारंभ में गार्ड और असाल्ट भूमिकाओं के लिए प्रशिक्षित किया गया। सुरक्षा कार्यों में सीमित रुचि के कारण इन्हें बाद में विस्फोटक पहचान डाग्स के रूप में पुनः प्रशिक्षित कर फील्ड यूनिट्स में तैनात किया गया। राजापालयम भी तमिलनाडु की स्वदेशी नस्ल है और अपने मजबूत क्षेत्रीय स्वभाव के लिए जानी जाती है। इन्हें कोम्बाई नस्ल के साथ ही प्राप्त किया गया और प्रशिक्षण का मुख्य फोकस सुरक्षा भूमिकाओं पर रहा। जून 2024 में प्राप्त राजापालयम श्वानों का दूसरा बैच वर्तमान में प्रशिक्षणाधीन है।
रामपुर हाउंड : उत्तर भारत की साइट-हाउंड नस्ल रामपुर हाउंड, जिसका वंश अफगान हाउंड से जुड़ा माना जाता है, पारंपरिक रूप से बड़े शिकार के लिए उपयोग की जाती रही है। अक्टूबर 2024 में प्राप्त पांच श्वानों को मुख्य रूप से सुरक्षा भूमिकाओं के लिए प्रशिक्षित किया गया। वर्तमान में तीन श्वानों को आर्मी डाग यूनिट्स को जारी किया जा रहा है, जबकि इन्हें स्थायी रूप से मिलिट्री वर्किंग डाग्स के रूप में शामिल किए जाने का अंतिम निर्णय फील्ड फार्मेशनों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर लिया जाएगा। |
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