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कृषि क्षेत्र में सुधार नहीं किया गया तो बरकरार नहीं रख पाएंगे विकास दरः डॉ. अशोक गुलाटी

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कृषि के विशिष्ट प्राध्यापक पद्मश्री डॉ. अशोक गुलाटी।  



रुमनी घोष। अगले रविवार को जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करेंगी, तो सबकी निगाहें इस पर टिकी होंगी कि अमेरिका के साथ चल रहे टैरिफ वार के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था कितनी स्थिर है?...और क्या आगे भी यह इस स्तर पर टिकी रहेगी? इन दो सवालों के साथ बजट का पूर्व आकलन करते हुए कृषि अर्थशास्त्री व भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (आइसीआरआइई) में कृषि के विशिष्ट प्राध्यापक पद्मश्री डॉ .अशोक गुलाटी कहते हैं ट्रंप का टैरिफ झेलने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था \“गोल्डीलाक\“ सिचुएशन में है।

हर भारतीय को इस पर गर्व करना चाहिए और शुक्रिया भी अदा करना चाहिए, लेकिन आने वाले सालों में जीडीपी में यह बढ़त बनी रहे, इसके लिए कृषि क्षेत्र में तत्काल प्रभाव से सरकार को तीन रिफार्म्स (सुधार नीति) करना चाहिए। यदि यह \“क्रांति\“ हम कर पाते हैं तो हमारे दोनों हाथ में लड्डू होंगे। इससे अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम लोग व पर्यावरण की सेहत सुधार की ओर से भी बड़ा कदम होगा। 72 साल की उम्र में भी उनका खेतों से सीधा जुड़ाव है। अंगुलियों पर आंकड़े गिनाकर फायदा-नुकसान समझा देने वाले डा. गुलाटी का दावा है कि सरल-साधारण उपायों से ही बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

डॉ. गुलाटी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी दोनों के कार्यकाल में प्रभावी रूप से सक्रिय रहे। वह 10 वर्षों से अधिक समय तक अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आइएफपीआरआइ) के निदेशक रहे। आरबीआइ, राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) और नेशनल कमोडिटीज एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (एनसीडीईएक्स) के केंद्रीय निदेशक मंडल में भी रहे हैं। वहीं वाजपेयी सरकार में प्रधानमंत्री सलाहकार परिषद के सदस्य भी रहे। वह कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) के अध्यक्ष रहे हैं। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां और उससे निपटने के लिए बजट 2026 में जरूरी उपायों को लेकर उनसे विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:
बजट पर बात शुरू करने से पहले भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था पर आपकी राय?

पहले तो मैं यह कहना चाहूंगा कि बहुत ही खुशी की बात है, भारत की अर्थव्यवस्था इस समय जो परफार्मेंस दे रही है, वह बहुत ही कमेंडेबल (प्रशंसनीय), श्रेष्ठ और विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ने वाली है। इसके लिए \“सैल्यूट\“ है। हमारी जीडीपी ग्रोथ (सकल घरेलू उत्पाद में विकास दर) लगभग 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। चूंकि जी-20 देशों में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर सबसे ऊपर है, इसलिए हम 7.3-7.4 प्रतिशत के आंकड़े को छू लेंगे।
आइएमएफ तो 7.4 प्रतिशत से 6.4 प्रतिशत गिरावट की बात कह रही है। आपके इस राय की वजह?

इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (आइएमएफ) का वह अनुमान वित्त वर्ष 2026-27 का है। वर्ष 2025-26 में विकास दर तो लगभग 7.4 प्रतिशत ही रहने का अनुमान है। डोनाल्ड ट्रंप के \“टैरिफ शाक\“ के बावजूद यह ग्रोथ अचरज भरा है। वैश्विक अस्थिरता और ट्रेड डील को लेकर अनिश्चितता के बावजूद यह ग्रोथ रेट बनाए रखना अपने आप में उपलब्धि है। इसके लिए हर भारतीय को खुश होना चाहिए और गर्व भी महसूस करना चाहिए।

  
एक ओर आप खुश होने की बात कह रहे हैं, दूसरी ओर अगले वित्तीय वर्ष में जीडीपी ग्रोथ गिरने की बात भी स्वीकार रहे हैं? इसका क्या आशय निकाला जाए?

इसको आप इस तरह से समझिए कि यह सिर्फ \“ग्रोथ\“ की कहानी नहीं है, इसमें \“रेजिलिएंस\“ भी है। अर्थशास्त्र में रेजिलिएंस का आशय अर्थव्यवस्था पर लगने वाले झटकों (मंदी, आपदा या अस्थिरता) से तेजी से उबरने की क्षमता को कहते हैं। अब कंज्यूमर प्राइस इनफ्लेशन (उपभोक्ता आधारित मुद्रास्फीति), यानी मंहगाई दर पर नजर डाले, तो दिसंबर में यह 1.3 प्रतिशत है। यह आरबीआइ से भी नीचे है। मोटे तौर पर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए दो चीज देखी जाती है, जीडीपी विकास दर और मंहगाई दर।

इस हिसाब से भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्तमान में विकास दर उच्च स्तर और मंहगाई दर निचले स्तर पर है। यह \“गोल्डीलाक सिचुएशन\“ है। ईरान में मंहगाई दर 30 प्रतिशत से ज्यादा है। अस्थिरता व अनिश्चतता के बावजूद हम \“ओशियन आफ स्टेबिलिटी\“ की स्थिति में है, यानी हमारी अर्थव्यवस्था स्थिर बनी हुई है।
कैसे मानें कि यह किसी तरह का गुब्बारा नहीं है, जो थोड़े समय बाद फूट जाएगा?

यह देखकर समझ में आ जाता है। हमारे यहां मारामारी नहीं है। ईरान की तरह हमारे यहां लोग सड़कों पर नहीं उतर रहे हैं। कोई आंदोलन नहीं हो रहा है। नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका की स्थिति हम देख चुके हैं। पाकिस्तान की तरह हमें आइएमएफ से भीख नहीं मांगना पड़ रही है। भुखमरी की स्थिति नहीं है, बल्कि कुल आबादी में से 56 प्रतिशत लोगों को मुफ्त अनाज मिल रहा है। हमारे पास 701.36 बिलियन डालर का रिजर्व (विदेशी मुद्रा भंडार) है।
इतिहास में इससे पहले क्या कभी गोल्डीलाक सिचुएशन बनी थी?

आमतौर पर जब जीडीपी विकास दर उच्च होती है, तो मंहगाई दर भी उच्च हो जाती है। जैसे डा. मनमोहन सिंह सरकार के समय जीडीपी ग्रोथ अच्छी थी, लेकिन मंहगाई दर भी उच्च था। इस बार दोनों ही श्रेष्ठ स्थिति में है। इसका क्रेडिट सरकार, आरबीआइ सहित चेन सिस्टम से जुड़े हर उस सेक्टर (क्षेत्र) को जाता है, जो बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
सबकुछ इतना चमकीला और सकारात्मक है, तो क्या यह मान लिया जाए कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कोई चुनौती नहीं है? वैश्विक बाजार में टिके रहने के लिए क्या किसी सुधार की जरूरत नही है?

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था इस स्थिति में तब है, जब सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर सहित कुछ सेक्टर ही बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। कृषि जैसे बड़े सेक्टर के प्रदर्शन में तो पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में गिरावट आई है। पिछले वित्तीय वर्ष में कृषि सेक्टर में विकास दर 4.6 प्रतिशत थी, जो इस वित्तीय वर्ष में गिरकर 3.1 प्रतिशत पर पहुंचने का आनुमान है, जबकि इस क्षेत्र में हमारा 45 प्रतिशत वर्कफोर्स (कार्यबल)जुड़ा हुआ है, यानी जो चमकीली तस्वीर दिख रही है, वह पैसेवालों की है। वहीं से \“डिमांड ड्राइव\“ हो रही है। जिनके पास पैसा है, वही खर्च कर रहे हैं। इसी वजह से होटल व एयरलाइंस की दरें इतनी बढ़ रही हैं। बेशक, यह भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, लेकिन बहुत छोटा है। जहां जनता जनार्दन है, वहां विकास दर धीमी है। कुल मिलाकर कृषि में उस तरह की चमक नहीं है, जो होनी चाहिए।

  
आपके आकलन अनुसार कृषि सेक्टर में विकास दर कितना होना चाहिए?

भारत की पापुलेशन ग्रोथ (आबादी विकास दर) 0.9 प्रतिशत है। इस हिसाब से कृषि सेक्टर में 4.5 से 5 प्रतिशत विकास दर को बेहतर माना जाता है। वर्तमान में यह दर सामान्य 3.1 प्रतिशत है, यानी बाजार में जितनी मांग है, वह पूरी हो रही है। यदि कृषि सेक्टर में ग्रोथ रेट बढ़ जाए तो हमारे दोनों हाथों में लड्डू हो सकता है। पिछले वित्तीय वर्ष में विकास दर में गिरावट का जो अनुमान लगाया जा रहा है, उसे थामा जा सकता है।
विकास दर को बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए?

सबसे पहले रेवड़ी संस्कृति को बंद करना होगा। यदि आप सर्वांगीण विकास व हर वर्ग का कल्याण चाहते हैं, तो वह चैरिटी (दान) से नहीं आएगी। अभी सरकारें कहीं दीदी, कहीं उर्वरक, कहीं मुफ्त राशन तो कहीं बेटी-बहनों के नाम पर रेवड़ी बांट रही हैं। ऊपर से कुल आबादी में से 56 प्रतिशत लोगों को मुफ्त राशन (गेहूं या चावल) बांटा जा रहा है। इससे स्थिति को सामान्य बनाए रखने में मदद जरूर मिल रही है, लेकिन विकास दर को उस ऊंचाई तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं, जो हम पहुंचा सकते हैं। रेवड़ी की वजह से लोगों की क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है। अब सवाल यह उठता है कि निवेश कैसे किया जाए...।

एक पुरानी कहावत है \“टीच हिम हाउ टू फिश, रैदर देन गिव हिम फिश एवरी डे\“, यानी व्यक्ति को मछली पकड़ना सिखाओ, बजाय उसे रोज मछली देने के। किसी भी देश का विकास वहां हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट से किया जाता है, यानी बड़ी-बड़ी इमारतें, एयरपोर्ट आदि बनना विकास की निशानी है। यहां तक भी कोई परेशानी नहीं है। आप कह सकते हैं कि लोगों को इस क्षेत्र में काम दे दिया जाए, लेकिन चुनौती यहीं से शुरू होती है। अब सामान्य श्रमिकों या कारीगरों की जरूरत नहीं है, जो सिर पर ईंट ढोते हुए कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुंच जाते हैं। उदाहरण के लिए देश में कांच की दीवारों वाले एयरपोर्ट्स बन रहे हैं। अन्य इमारतें, ब्रिज, हाइ-वे, टनल बनाने के लिए कुशल श्रमिकों की जरूरत है। रेवड़ी बांटने से ऐसे श्रमिक तैयार नहीं होंगे, बल्कि उसी राशि का उपयोग श्रमिकों के कौशल विकास के लिए होना चाहिए। इससे श्रमिकों की आय 10 हजार बढ़कर बीस-तीस या पचास हजार तक पहुंच सकती है। जब यह होगा तो आम जनता बड़े पैमाने पर जीडीपी विकास में अपना योगदान दे पाएगी।
कृषि क्षेत्र में किन सुधारों की जरूरत है?

बड़े स्तर पर सिर्फ तीन सुधार की जरूरत है। पहला कृषि क्षेत्र से जुड़े वर्कफोर्स को कम करना है। दूसरा, उर्वरकों व कृषि उपकरणों से सब्सिडी खत्म की जाए। तीसरा, धान की पैदावर को थोड़ा कम कर हाई वैल्यू क्राप, यानी उच्च कीमत देने वाली फसलों की उत्पादकता बढ़ाना। अब मैं एक-एक सुधारों की व्याख्या करता हूं।

  • मैंने आपको पहले बताया था भारत में 45 प्रतिशत वर्कफोर्स कृषि क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। जीडीपी विकास दर में इनका योगदान मात्र 17 प्रतिशत है। यही सबसे बड़ी गड़बड़ी है। पहले, हमें यह वर्कफोर्स को कम करना है। यहां से लोगों को निकालकर दूसरे सेक्टर से जोड़ना है, ताकि उनकी आय भी बढ़े और देश की जीडीपी में उनका योगदान भी बढ़ेगा। चीन में 20 करोड़ लोग कृषि क्षेत्र से निकलकर शंघाई, हांगकांग में चल रहे निर्माण कार्यों से जुड़े हैं। अन्य विकसित देशों में भी यही ट्रेंड देखा गया है।
  • दूसरा, उर्वरकों व उपकरणों पर सब्सिडी खत्म कर सरकार किसानों के खाते में सीधी मदद पहुंचाए। इससे उर्वरकों के अंसुतलित उपयोग और लीकेज पर भी रोक लगेगी। हाल ही में चीन सरकार ने 24-25 बिलियन डालर किसानों के खाते में दिया है।
  • हाई वैल्यू क्राप यानी फल-सब्जियों की खेती, मुर्गी पालन या डेयरी प्लांट व झींगा पालन में निवेश होना चाहिए। अमेरिका में हमारा सबसे बड़ा बाजार झींगा मछली सप्लाय का है। आंध्र प्रदेश के किसान बड़े पैमाने पर झींगा पालन व उत्पादन कर रहे हैं और आम किसानों की तुलना में दस गुना ज्यादा कमा रहे हैं।

यदि आंध्र प्रदेश में नीली क्रांति हो सकती है तो ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, बंगाल सहित समुद्र किनारे बसे राज्यों में क्यों नहीं हो सकता है?

नौ राज्य और चार केंद्रशासित प्रदेश की मुख्य भूमि और द्वीपों को मिलाकर हमारे पास 7,516.6 किमी लंबी तट रेखा है। खाड़ी देशों में पैदावार नहीं हो सकती है, तो पंजाब-हरियाणा के किसानों के लिए वहां बाजार क्यों नहीं तलाशा जा सकता है। भारत के पास आवश्यकता से कहीं अधिक खाद्यान्न की उपलब्धता है। पंजाब-हरियाणा के किसान गेहूं-चावल की पैदावार बढ़ाकर उसे गोदामों में सड़ाने के बजाय हाई वैल्यू क्राप (उच्च कीमत पर बिकने वाली खाद्य सामग्री) की ओर क्यों नहीं जा सकते हैं।

  

जैसा महाराष्ट्र के कई किसान समूह कर रहे हैं। हाल ही में मैंने महाराष्ट्र के एक फार्म का दौरा किया। वहां किसान अंगूर का उत्पादन कर यूरोप सप्लाय कर रहे हैं और आम किसानों की तुलना में कई गुना ज्यादा कमाई कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर किसान इस तरह के प्रयोगों का फायदा ले पाएं, इसके लिए ही सरकार को पालिसी लाना चाहिए।
इतने सहज उपाय उपलब्ध हैं तो इतने सालों में किसी भी सरकार ने इन सुधार नीतियों को लागू क्यों नहीं किया? परेशानी कहां है?

यदि आप कृषि मंत्रालय से देशभर के किसानों की सूची मांगेंगे तो वह आपको नहीं दे पाएंगे। दरअसल लैंड रिकार्ड व्यवस्थित नहीं होने की वजह से यह पता लगाना बहुत मुश्किल है कि वास्तविक किसान कौन हैं। 25-30 प्रतिशत किराएदार हैं, जिनके पास लैंड रिकार्ड नहीं है। किसान बंटाई पर काम कर रहे हैं। यदि सीधी सब्सिडी दी जाए तो किसके खाते में जाएगी। नीतियां बनाई गई तो उसके दायरे में कौन-कौन आएंगे। संभवतः सरकार इसी विवाद से बचना चाहती है।
तो क्या लैंड रिकार्ड व्यवस्थित कर असली किसानों का पता लगाना संभव नहीं है?

तकनीक के युग में कुछ भी मुश्किल नहीं है। सरकार चाहे तो स्पेस टेक्नोलॉजी का उपयोग छह महीने के भीतर सारे लैंड रिकार्ड दुरुस्त कर सकती है। बस केंद्र और राज्य को मिलकर काम करना होगा।
यदि इन नीतियों को लागू कर दिया जाए, तो कितने साल के भीतर परिणाम मिल सकते हैं?

पंजाब और हरियाणा में तो इन नीतियों को 20 साल पहले ही लागू कर देना चाहिए था। हरित क्रांति के दौरान इन दोनों राज्यों ने अपना सबकुछ झोंक दिया था। जब हमने देश की कुल आबादी के लिए अनाज जुटा लिया, और देश के अन्य राज्यों में पैदावार होने लगी तो हमें इन दोनों राज्यों को धान जैसे अधिक पानी सोखने वाली पैदावार से मुक्ति देकर हाई वैल्यू क्राप की ओर ले जाना चाहिए था।
आपने उर्वरक सब्सिडी को \“डायनासोर\“ करार दिया था। क्यों? सुधार की अपेक्षाएं?

उर्वरक सब्सिडी सिर्फ पैसों का मामला नहीं है...यह किस तरह से इंसान व पर्यावरण की सेहत को प्रभावित कर सकता है, इसका जीवंत उदाहरण है। भारत में उर्वरक सब्सिडी लगभग दो लाख करोड़ रुपये की है। इसमें भी यूरिया पर 80-85 प्रतिशत सब्सिडी है। फॉस्फेट व पोटाश पर सब्सिडी कम है। यूरिया पर सब्सिडी ज्यादा होने की वजह से किसान आवश्यकता से कहीं अधिक यूरिया का उपयोग कर रहे हैं। इससे मिट्टी में असंतुलन पैदा हो रहा है। यूरिया के अधिक उपयोग से इससे निकलने वाली नाइट्रोजन से फसलों में हरियाली तो अधिक होती है, लेकिन पोटाश व फास्फेट की कमी से फलन नहीं हो रहा है।

इससे 30-40 प्रतिशत तक पैदावार कम हो रही है। हमारे देश में जिस तरह से उर्वरकों का छिड़काव किया जाता है, उसमें से सिर्फ 35-40 प्रतिशत यूरिया ही फसलों को मिल रही है, जबकि बाकी यूरिया नाइट्रस ऑक्साइड गैस बनकर हवा में घुल रहा है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 273 गुना ज्यादा नुकसानदायक है। इस तरह से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। मिट्टी में अधिक नाइट्रोजन होने की वजह से वह ग्राउंड वाटर में भी मिल रहा है। इससे थायराइड, डायबिटीज व कैंसर जैसी बीमारियां हो रही हैं। जिंक में सब्सिडी नहीं होने की वजह से किसान इसका उपयोग खेती में नहीं कर रहे हैं, जिसकी वजह से हमारी मिट्टी में जिंक की कमी हो गई है।

इसकी वजह से बच्चों में \“स्टनटिंग\“ की शिकायत सामने आ रही है। यानी बच्चों का दिमागी विकास प्रभावित हो रहा है। यदि एक पीढ़ी दिमागी रूप से कमजोर होगी तो वह जिंदगीभर क्षमतानुरूप आय नहीं कर पाएगा और आखिरी में यह देश की जीडीपी ग्रोथ को प्रभावित करेगा। इसके अलावा सबसे बड़ी परेशानी यह है कि 20-25 प्रतिशत उर्वरक का उपयोग खेती में नहीं हो रहा है। इसका उपयोग अवैध तरीके से अन्य उद्योगों में हो रहा है। या फिर नेपाल सहित अन्य देशों में अवैध सप्लाई हो रही है।
यूरिया लीकेज कितना है?

दो लाख करोड़ में 20 प्रतिशत यदि लीकेज है तो 40 हजार करोड़ का सालाना नुकसान हो रहा है। मैं तो इसे बड़ा स्कैम या घोटाला कहूंगा। मजे की बात यह है कि कृषि मंत्रालय का कुल बजट 1.37 लाख करोड़ रुपये है और उर्वरक सब्सिडी दो लाख करोड़ है। यानी कृषि मंत्रालय के बजट से ज्यादा सब्सिडी दे रहे हैं और यह कृषि मंत्रालय के अधीन नहीं है। उर्वरक सब्सिडी केमिकल इंडस्ट्री के अधीन है। इस तरह की अनियमितताओं को दूर करने और लीकेज रोकने के लिए उर्वरकों पर सब्सिडी खत्म कर किसानों को सीधी सब्सिडी दी जाए।
कृषि क्षेत्र में किस तरह के नवाचारों की जरूरत है?

कृषि क्षेत्र की बात करें तो भारत में अभी तक तीन हरित, श्वेत और नीली क्रांति हुई है। दुख के साथ कहना पड़ता है कि तीनों ही क्रांति स्वदेशी नहीं थी। हमने विदेश से बीज मंगवाए और उसे पैदा किया। यदि सरकार चाहती है कि अगली क्रांति \“स्वदेशी\“ हो तो हमें शोध के लिए बजट बढ़ाने की जरूरत है। विदेश की एक निजी कंपनी कृषि क्षेत्र में शोध पर सालाना 1.7 बिलियन डॉलर खर्च कर रही है, वहीं भारत में इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आइसीएआर) सहित सभी सरकारी शोध संस्थानों का कुल बजट महज 1.1 बिलियन डॉलर का बजट है।

  

जहां तक नवाचारों की बात है तो इजरायल और हालैंड \“लैंड आफ इनोवेशन\“ कहलाते हैं। पानी का उपयोग देखना है तो इजराइल की नीतियों को देखना चाहिए। यहां पानी के एक-एक बूंद का हिसाब रखा जाता है। नई तकनीक का उपयोग कर अधिक पैदावार लेना है तो हालैंड से सीखना चाहिए। कम जमीन होने के बावजूद हालैंड कृषि क्षेत्र में दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। चीन भी इस क्षेत्र में अच्छा काम कर रहा है।
भारत-अमेरिका का टैरिफ डील कृषि और डेयरी सेक्टर को लेकर अटका हुआ है। बतौर कृषि अर्थशास्त्री आपका सुझाव।

देखिए, राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का तरीका अनैतिक हो सकता है, लेकिन टैरिफ को लेकर उसकी नीतियां अमेरिका के हितों पर आधारित मानी गई हैं। मैं उसे गलत नहीं मानता हूं। यदि मुझसे पूछा जाए तो मैं सलाह दूंगा कि हमें एक सीमित मात्रा में उनके लिए बाजार खोल देना चाहिए। उदाहरण के लिए हम उनका मक्का इसलिए आयात नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि वह जीएम (जीन माडिफाइड यानी अनुवांशिक संशोधित) है। यदि हम उनसे मक्का खरीदकर इथेनाल प्लांट को सप्लाई कर दें तो क्या दिक्कत है। इसी तरह डेयरी प्रोडक्ट्स के लिए भी उपाय है कि हम इस बात पर डील करें कि वह वही मिल्क प्रोडक्ट भारत भेजें, जिन पशुओं को शाकाहारी प्रोटीन या चारा खिलाया जाता है। इससे हमारे बाजार को भी नुकसान नहीं होगा और संभवतः डील की रुकावट हटेगी।

हमें अपनी टैरिफ का भी आकलन करना चाहिए। उदाहरण के लिए दुनिया में चावल का व्यापार सालाना कुल 61 मिलियन टन का है। इसमें से 20 मिलियन टन हम सप्लाई करते हैं। अब हमने इस पर 70 प्रतिशत इम्पोर्ट ड्यूटी लगा रखी है। इसी तरह हमें भी सोचना होगा। यदि हम अगले साल भी इस ग्रोथ को बरकरार रखना चाहते हैं तो हमें इस तरह का कोई विकल्प तलाशना ही होगा। यूरोप, रूस, चीन का बाजार हमारी जरूरतों को पूरी नहीं कर पाएगा।

\“\“ छह इंच की मिट्टी ने सारी दुनिया को थाम रखा है। यदि हमने इसका ख्याल नहीं रखा तो यह आपका ख्याल नहीं रखेगी। मिट्टी में साइल आर्गानिक कार्बन (एसओसी) एक प्रतिशत होना चाहिए, लेकिन हमारी 75 प्रतिशत मिट्टी में इसकी मात्रा 0.7 प्रतिशत हो गई है। उर्वरकों के असंतुलित उपयोग और खेती के गलत तरीकों की वजह से हमारी मिट्टी आइसीयू में है। यह उत्पादन और कृषि विकास दर दोनों को प्रभावित कर रहा है। \“
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