लाखों रुपये का पैकेज छोड़ दिलबाग ने गांव में लगाया दिल, नई पीढ़ी के लिए बने प्रेरणा स्रोत।
विनोद चौधरी, कुरुक्षेत्र। लाखों रुपये का पैकेज छोड़कर गांव में आए आलमपुर के प्रगतिशील किसान दिलबाग ने खेती-किसानी से ऐसा नाता जोड़ा की अब उसकी तरक्की से देखने वालों दिल भी बाग-बाग हो रहा है।
दिलबाग ने अपने ही खेतों में आत्मनिर्भर गांव की ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसे देखने के लिए अन्य गांवों के किसान भी पहुंच रहे हैं। अभी तक 150 से अधिक किसान उसके इंटीग्रेटेड फार्मिंग के माडल को देखने पहुंचे हैं। इनमें से 50 से अधिक ने अपना काम शुरू किया और 200 से अधिक ग्रामीणों को रोजगार दे रहे हैं।
दिलबाग ने अपने खेतों में ही पोल्ट्री व्यवसाय शुरू किया। प्राकृतिक खेती से जुड़ते हुए रासायनिक खाद का उपयोग बंद कर पोल्ट्री से निकलने वाली खाद से खेती शुरू की, जिससे पैदावार में बढ़ोतरी हुई। यहीं से निकलने वाले व्यर्थ जा रहे पानी से एक तालाब बनाकर मछली पालन व्यवसाय शुरू किया।
इसके साथ में ही गायों की डेयरी बना दूध का व्यवसाय शुरू किया। अपने ही खेत में इंटीग्रेटेड फार्मिंग से नवाचार करते हुए कृषि से मिलते-जुलते काम धंधे शुरू कर दिलबाग हर माह लाखों रुपये कमा रहा है। वह युवाओं के लिए एक सीख भी बने हैं कि विदेशों की ओर दौड़ने की बजाय अपना व्यवसाय शुरू कर वह अपने ही देश में अच्छी कमाई कर सकते हैं।
गांव आलमपुर के दिलबाग एक लिमिटेड कंपनी में अच्छी खासी नौकरी करते थे। गुजरात और महाराष्ट्र में नौकरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 2010 मेंं गांव में पहुंचकर अपनी ही खेती को संभालना शुरू किया। उन्होंने पिता शेर सिंह की ओर से शुरू किए पोल्ट्री व्यवसाय से शुरुआत करते हुए 4300 मुर्गियों का पोल्ट्री संभालना शुरू किया।
इसके बाद वर्ष 2012, 2016 और 2018 में तीन पोल्ट्री और लगाए। इसी पोल्ट्री से निकलने वाली खाद को अपने खेतों में डाला, इससे पैदावार बढ़ने लगी। इन्हीं पोल्ट्री से निकलने वाले व्यर्थ पानी के लिए वहीं खेत के एक कोने में छोटा तालाब बनाया और इसमें मछली पालन किया। इस मछली पालन से ही प्रतिवर्ष दो से 2.50 लाख रुपये तक की आमदनी शुरू हुई। खेतों में ही डेयरी व्यवसाय कर इससे प्रति दिन तीन क्विंटल तक दूध का उत्पादन शुरू किया। वह उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा स्त्रोत बन गया है जो लाखों रुपये कमाने की चाह में डंकी रूट से विदेश जा रहे हैं।
प्राकृतिक खेती पर दे रहे ध्यान
खेतों से रासायनिक खाद को दूर कर दिलबाग प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। वह फसलों में अपने पोल्ट्री से निकलने वाली खाद डाल रहे हैं। अपने पिता की दी हुई सीख मानते हुए है किसानों को इसे निशुल्क दे रहे हैं। इसके बाद भी हर वर्ष राजस्थान से आने वाली फर्म को दो से ढ़ाई लाख रुपये की खाद बेच रहे हैं।
प्रतिदिन सुबह साढ़े तीन बजे उठकर अपना काम संभालने वाले दिलबाग ने कहा कि उन्होंने कोविड काल में महसूस किया कि मनुष्य को खाने के लिए स्वच्छ अन्न और शुद्ध दूध नहीं मिल रहा। अगर गांव में ही ऐसी स्थिति है तो मैट्रो सिटी में हालात कैसे होंगे। इसके बाद ही उन्होंने अपने खेत में ही पशु डेयरी बनाई और रासायनिक खादों को खेती से दूर किया।
1997 से आज तक कभी भी फानों में नहीं लगाई आग
दिलबाग सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने खेतों में कभी भी फानों को आग नहीं लगाई। इसके साथ ही वह 14 साल से खेतों में धान की सीधी बिजाई कर रहे हैं। इससे पानी की बचत हो रही है। उन्होंने किसानों से भी अपील की है कि वह फानों में आग नहीं लगाएंगे और खेत की मिट्टी को जलने से बचाएंगे तो यही मिट्टी अन्न के भंडार भर कर उन्हें माला-माल कर देगी। उनके पर्यावरण और जल संरक्षण को देखकर 50 से अधिक किसान अब सीधी बिजाई कर रहे हैं। |
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