सांकेतिक तस्वीर।
जागरण संवाददाता, आगरा। मध्य प्रदेश के हार्दा जिले में बसे राजाबरारी एस्टेट के गोंड और कोरकू आदिवासी समुदाय अब वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान से अपनी जिंदगी बदल रहे हैं। दयालबाग शिक्षण संस्थान (डीईआई) ने अप्रैल 2021 में शुरू की गई एक विशेष परियोजना के जरिए इन आदिवासियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का काम किया है। यह परियोजना अक्टूबर 2024 में पूरी हुई और इसके परिणाम सामाजिक समरसता की मिसाल बन गए हैं।
डीईआई के रसायन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रोहित और प्रो. अनीता लखानी के नेतृत्व में चली इस परियोजना ने न सिर्फ आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि शहरी और ग्रामीण समाज के बीच की दूरी को भी कम किया। टीम में डॉक्टर प्रिया कुमारी, कॉर्डिनेटर सुमीर देवगुप्तपु, गुंजन गोस्वामी, नेहा और सुधीर शामिल रहे। जिन्होंने आदिवासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।
दयालबाग शिक्षण संस्थान के सहयोग से बदल रही आदिवासी समुदाय की जिंदगी
राजाबरारी एस्टेट एक घने जंगलों वाला क्षेत्र है, जहां करीब 10 गांवों में लगभग छह हजार लोग रहते हैं। यहां गोंड और कोरकू जनजातियां सदियों से पारंपरिक तरीके से रह रही हैं, लेकिन गरीबी, शिक्षा की कमी और आधुनिक संसाधनों से दूरी ने उनकी प्रगति रोक रखी थी। डीईआई की यह परियोजना भारत सरकार की डीएसटी-सीड (डिपार्टमेंट आफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी साइंस फॉर इक्विटी, एम्पावरमेंट एंड डेवलपमेंट) योजनाओं से प्रेरित है, जो आदिवासी क्षेत्रों में वैज्ञानिक हस्तक्षेप से विकास को बढ़ावा देती है।
रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर विशेष परियोजना के माध्यम से बना रहे आत्मनिर्भर
प्रो. अनीता लखानी के अनुसार, डीईआई लंबे समय से राजाबरारी में पहल चला रहा है। जिसका उद्देश्य आर्थिक सशक्तिकरण पर था। परियोजना के तहत 1948 आदिवासी परिवारों को प्रशिक्षण दिया गया। वे पारंपरिक कृषि को आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से जोड़कर सीखे। जैसे, मिट्टी और पानी की जांच के लिए लैब स्थापित की गईं, जिससे फसलों की पैदावार बढ़ी। आदिवासी महिलाओं और पुरुषों को खाद्य प्रसंस्करण की ट्रेनिंग दी गई। जैसे जंगली फलों, अनाज और डेयरी उत्पादों को पैक करके बेचने लायक बनाना।
एफएसएसएआई (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथारिटी ऑफ इंडिया) का सर्टिफिकेट मिलने से उनके उत्पादों की गुणवत्ता प्रमाणित हो गई। अब वे इंदौर जैसे शहरों में अपने पैकेट बेचकर कमाई कर रहे हैं। परियोजना की सफलता का अंदाजा इसी से लगता है कि 90 प्रतिशत लोगों को रोजगार मिला, जिसमें 65 प्रतिशत महिलाएं हैं। ये महिलाएं घर से काम करके परिवार चला रही हैं, जो लैंगिक समानता और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देता है।
आर्थिक मजबूती के साथ हुई सांस्कृतिक आदान-प्रदान
यह परियोजना सामाजिक समरसता की थीम को पूरी तरह से जीवंत करती है। एक तरफ शहरी वैज्ञानिक और शिक्षक, दूसरी तरफ जंगलों में रहने वाले आदिवासी। दोनों ने मिलकर काम किया। इससे न सिर्फ आर्थिक मजबूती आई, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ। आदिवासी अपनी पारंपरिक ज्ञान साझा करते और वैज्ञानिक उन्हें नई तकनीकें सिखाते। राजाबरारी में चल रही शिक्षा परियोजनाएं इस नई योजना से जुड़कर और मजबूत हुईं।
बढ़ाया रोजगार, कम की गरीबी
इस परियोजना के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी ने परिवारों में समानता बढ़ाई है साथ ही रोजगार ने गरीबी कम की। दयालबाग शिक्षण संस्थान के निदेशक प्रो. सी. पटवर्धन ने बताया अब राजाबरारी के लोग आत्मनिर्भर हैं और वे दूसरे आदिवासी क्षेत्रों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। डीईआई के इस प्रयास को देख कर कहा जा सकता है कि सामाजिक समरसता तभी संभव है जब सभी वर्ग एक-दूसरे का हाथ थामें। |