माह पांच डलहौजी में ठहरे थे नेताजी, आजादी की बनाई थीं योजनाएं। फाइल फोटो
विशाल सेखड़ी, डलहौजी। आजाद हिंद फौज के संस्थापक एवं महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती पराक्रम दिवस के रूप में मनाई जा रही है। नेताजी का पर्यटन नगरी डलहौजी से भी गहरा नाता रहा है। केंद्र सरकार के तत्वावधान में डलहौजी में भी नेताजी की जयंती पर आज कार्यक्रम आयोजित होगा।
कार्यक्रम में नेताजी के डलहौजी प्रवास व ठहराव के किस्से फिर से जीवंत होंगे। नेताजी के डलहौजी प्रवास व ठहराव से जुड़ी कई यादें व उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया सामान बिस्तर, मेज, कुर्सी इत्यादि आज भी डलहौजी के गांधी चौक के समीप स्थित कायनांस कोठी में संरक्षित हैं।
क्षयरोग होने पर स्वास्थ्य लाभ के लिए नेताजी लगभग पांच माह डलहौजी में ठहरे थे। देश की आजादी के लिए कई गुप्त योजनाएं भी नेताजी ने डलहौजी में ही बनाईं थीं। डलहौजी प्रवास दौरान नेताजी जिस होटल व कोठी में ठहरे थे, वह आज भी मौजूद हैं। उनके उपयोग किए बिस्तर, कुर्सी, टेबल व अन्य सामान भी सुरक्षित रखा गया है।
वर्ष 1937 में अंग्रेजों की कैद में नेताजी को क्षयरोग (टीबी) के लक्षण पाए गए थे। नेताजी के बीमार होने पर अंग्रेजों ने उन्हें रिहा कर दिया था। मई 1937 में नेताजी डलहौजी आए थे। वह गांधी चौक के समीप स्थित डलहौजी के सबसे पुराने होटलों में से एक होटल मेहर के कमरा नंबर 10 में ठहरे थे। इंग्लैंड में नेताजी की सहपाठी रही कांग्रेस नेता डॉ. धर्मवीर की पत्नी जेन धर्मवीर को जब नेताजी के डलहौजी में होने का पता चला तो वह भी मेहर होटल पहुंच गईं।
जेन धर्मवीर ने नेताजी को होटल में रहने के बजाय गांधी चौक के समीप ही पंजपूला मार्ग स्थित उनकी कोठी कायनांस में रहने का अनुरोध किया। क्योंकि डा. धर्मवीर भी नेताजी के मित्र थे, इसलिए नेताजी ने भी जेन धर्मवीर का आग्रह स्वीकार कर लिया और वह कायनांस कोठी में रहने के लिए आ गए। होटल मेहर से कायनांस कोठी ले जाने से पहले तत्कालीन डलहौजी कांग्रेस के प्रधान गुलाम रसूल की अगुआई में शहरवासियों ने नेताजी का भव्य स्वागत किया था।
शुद्ध जलवायु से मिला था स्वास्थ्य लाभ
डलहौजी में करीब पांच माह के प्रवास दौरान नेताजी करेलनू मार्ग पर नियमित सैर करते थे और बावड़ी का पानी पीते थे। बावड़ी के समीप वन क्षेत्र में घंटों बैठकर नेताजी देश को आजाद करवाने की योजनाएं बनाते थे। नेताजी की गुप्त डाक बावड़ी के समीप वन क्षेत्र में ही एक्सचेंज होती थी। हालांकि डाक कौन लेकर आता व जाता था, यह आज तक रहस्य ही है। नियमित सैर व बावड़ी का पानी पीकर नेताजी को स्वास्थ्य लाभ हुआ था।
नेताजी के सम्मान में रखा गया बावड़ी व शहर के चौक का नाम
डलहौजी में नेताजी को जिस बावड़ी के पानी का नियमित सेवन करने से स्वास्थ्य लाभ हुआ था, उस बावड़ी को नेताजी के नाम पर सुभाष बावड़ी के नाम से जाना जाता है। बावड़ी की देखरेख का जिम्मा नगर परिषद डलहौजी संभालती है। वहीं शहर के एक चौक का नाम भी नेताजी के नाम पर सुभाष चौक रखा गया है, चौक में नेताजी की आदमकद प्रतिमा लगी है।
बिना किसी से मिले डलहौजी से लौट गए थे नेताजी
नेताजी अक्टूबर में एक दिन बिना किसी को मिले डलहौजी से लौट गए थे। बताया जाता है कि नेताजी डलहौजी से एक लारी (ट्रक) में बैठकर पठानकोट गए थे। यह भी बताया जाता है कि उक्त लारी में पठानकोट से अखबार व रसाले (मैगजीन) इत्यादि की सप्लाई डलहौजी आती थी। डलहौजी से पठानकोट जाने के लिए नेताजी के लिए उसी लारी में व्यवस्था की गई थी। लारी के पीछे एक कुर्सी रखी गई थी जिस पर बैठकर नेताजी पठानकोट तक गए थे। |
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