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अब सिर्फ 10 सेकेंड में पता चलेगा हार्ट अटैक का खतरा, BHU ने बनाया खास सेंसर

cy520520 1 hour(s) ago views 979
  

इम्पेडिमेट्रिक सेंसर रक्त में मौजूद सीआरपी स्तर को बेहद सटीकता और तेजी से माप सकेगा। सांकेतिक तस्वीर  



संग्राम सिंह, वाराणसी। देश में बढ़ते हृदय रोगों और साइलेंट हार्ट अटैक के खतरों के बीच काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के रसायन विज्ञानियों ने खास तकनीक विकसित की है। उन्होंने एक ऐसा इम्पेडिमेट्रिक सेंसर बनाया है, जो रक्त में मौजूद सी-रिएक्टिव प्रोटीन (सीआरपी) के स्तर को बेहद सटीकता और तेजी से मापेगा।

वर्तमान में हृदय रोगों के जोखिम का पता लगाने के लिए होने वाली जांचें अक्सर समय लेने वाली और महंगी होती हैं, लेकिन यह सेंसर 0.5 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर जैसे बेहद कम स्तर पर भी सीआरपी की पहचान करेगा। यह नैनो-सेंसर महज 10 सेकेंड में परिणाम देने में सक्षम होगा और सामान्य से लेकर उच्च जोखिम वाले (0.5 से 400 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर) दोनों स्तरों की जांच कर सकेगा।

रसायन विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं का कहना है कि सीआरपी को मानव शरीर में हृदय संबंधी रोगों का प्रमुख संकेतक (मार्कर) माना गया है। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता मालिक्यूलर इम्प्रिंटेड पालीमर (एमआइपी) और बिस्मथ-युक्त कोबाल्ट फेराइट नैनोकणों का अनूठा मेल है। एमआइपी को आर्टिफिशियल एंटीबाडी कहते हैं, यह ऐसा पालिमर है जिसे केवल सीआरपी अणुओं को ही पकड़ने के लिए डिजाइन किया गया है।

विज्ञानियों ने विशेष कार्यात्मक मोनोमर (4-नाइट्रोफेनिल मेथाक्रायलेट) और क्रासलिंकर का उपयोग कर तैयार किया है। सेंसर को इंडियम टिन आक्साइड (आइटीओ) इलेक्ट्रोड पर इलेक्ट्रोफोरेटिक डिपोजिशन प्रक्रिया से विकसित किया गया है। चूंकि देश में मृत्यु दर का सबसे बड़ा कारण हृदय रोग है, ऐसे में कार्डियक अरेस्ट की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए समय पर और सटीक जांच जीवन बचाने के लिए आवश्यक है।

यह भी पढ़ें- वाराणसी मतदाता सूची ड्राफ्ट प्रकाशित: रोहिंग्या-बांग्लादेशी नहीं मिले, गलती से कटा है नाम तो करना होगा दावा-आपत्ति

यह इलेक्ट्रोकेमिकल सेंसर के बाजार में आने से भविष्य में क्लिनिक और अस्पतालों में हृदय रोगों का आकलन अधिक सुलभ और किफायती हो सकता है। इस शोध को हाल में यूनाइटेड किंगडम के जर्नल आफ मैटेरियल्स केमिस्ट्री बी ने प्रकाशित किया है। शोध टीम में रसायन विज्ञान विभाग के डा. जय सिंह, सैम हिगिनबाटम कृषि, प्रौद्योगिकी और विज्ञान विश्वविद्यालय प्रयागराज की डा. नीलोत्तमा सिंह के अलावा शोधार्थी सिद्धिमा सिंह और आस्था सिंह शामिल रहे।
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