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दिवालिया होने वाला था भारत, कैसे मनमोहन सिंह के फैसले लाए क्रांति, डूबती अर्थव्यवस्था को उबार दिया?

deltin55 3 hour(s) ago views 2

               
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन से आज हर देशवासी शोकाकुल है. हो भी क्यों नहीं, वही तो थे जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचा लिया था. आज दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था अगर पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है तो इसका श्रेय उन्हीं को जाता है.


तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली सरकार में वित्त मंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों का जो रास्ता दिखाया, उस पर आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ रही है. आइए जान लेते हैं डॉ. मनमोहन सिंह के वे आर्थिक सुधार जिन्होंने भारत को तरक्की की राह दिखाई.







वह साल 1985 का समय था, भारत में भुगतान के संतुलन की दिक्कत होने लगी थी. सरकार का खर्च अधिक था और आय कम. आय और व्यय के बीच असमानता ज्यादा थी. साल 1990 के आखिर तक आते-आते देश के सामने गंभीर आर्थिक संकट आ चुका था. सरकार डिफॉल्टर होने के करीब पहुंच चुकी थी. केंद्रीय बैंक ने और नए कर्ज देने से इनकार कर दिया था. साल 1991 में स्थिति और बिगड़ गई थी. खाड़ी युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमत आसमान पर पहुंच गई थी. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार केवल छह बिलियन डॉलर रह गया था. इससे पेट्रोलियम समेत दूसरी आवश्यक वस्तुओं का अधिकतम दो सप्ताह तक आयात किया जा सकता था.

        


ऐसे में संकटमोचक बन कर आए डॉ. मनमोहन सिंह. प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली केंद्र सरकार में वित्त मंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधार शुरू किए. उदारीकरण, निजीकरण, वित्तीय क्षेत्र, टैक्स में सुधार,प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, वैश्वीकरण और सुधार व्यापार नीति पर कई बड़े फैसले लिए गए. 24 जुलाई 1991 को केंद्रीय बजट पेश करते हुए उन्होंने कहा था कि अब समय बरबाद करने का अवसर नहीं है. न तो सरकार और न ही अर्थव्यवस्था सालोंसाल अपनी क्षमता से ज्यादा खर्च कर सकती है. उधारी या वक्त पर काम करने की तनिक भी गुंजाइश नहीं है.


अपने बजट भाषण के अनुसार ही डॉ. मनमोहन सिंह ने उपाय लागू करने शुरू किए. इनमें सबसे पहले स्थिरीकरण जैसे अल्पकालिक उपाय थे. इसके जरिए तात्कालिक आर्थिक संकट को हल किया. भुगतान असंतुलन के कारण पैदा हुई आर्थिक कमजोरी को दूर कर मुद्रास्फीति को काबू में करने के लिए कदम उठाए गए. साथ ही साथ उन्होंने दीर्घकालिक संरचनात्मक उपाय किए, जिससे अर्थव्यवस्था में सुधार आया. इन सुधारों में शामिल थे उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण.



डॉ. मनमोहन सिंह ने उदारीकरण का दौर शुरू किया और लाल फीताशाही पर लगाम कसी. उद्योगों का विनियमन किया गया. शराब, सिगरेट, रसायन, दवाएं, विस्फोटक आदि कैटेगरी को छोड़कर बाकी क्षेत्रों के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग की व्यवस्था खत्म कर दी गई. केवल सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित रखे गए कई औद्योगिक क्षेत्रों को धीरे-धीरे निजी हाथों में देने की शुरुआत हुई. उन्हें अनारक्षित कर दिया गया. बाजार को अपने उत्पादों की कीमतें खुद निर्धारित करने की अनुमति दी गई. हालांकि, इन पर किसी हद तक लगाम भी रखी गई. रेलवे, रक्षा उपकरण और परमाणु ऊर्जा उत्पादन जैसे क्षेत्र को ही सार्वजनिक क्षेत्र में रखा गया.


भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की भूमिका को भी कम किया गया. इसे वित्तीय क्षेत्र के नियामक से सुविधाकर्ता तक घटाया गया. इसके कारण निजी बैंक स्थापित किए गए. इनमें एफडीआई को बढ़ाकर 50 फीसद तक कर दिया गया. हालांकि, ग्राहकों के हित बनाए रखने के लिए कुछ प्रबंधकीय पहलू आज भी आरबीआई के पास ही हैं.



पहले देश में भारी भरकम कॉरपोरेट टैक्स लगाया जाता था. इनको धीरे-धीरे कम किया गया. टैक्स की प्रक्रिया को सरल बनाया गया. साल 197374 में 10 से 85 फीसदी तक की दरों वाले 11 टैक्स स्लैब थे, वहीं साल 1991 से 96 के बीच डॉ. मनमोहन सिंह ने आय कर स्लैब को घटाकर तीन कर दिया और टैक्स की दरें 20, 30 और 40 फीसदी पर आ गईं. विदेशी मुद्रा के मुकाबले रुपए का अवमूल्यन हुआ. इससे विदेशी मुद्रा में बढ़ोतरी हुई. बाजार को ही विदेशी मुद्रा की दरों को निर्धारित करने की अनुमति दी गई.


इसके अलावा आयात पर मात्रा की सीमा को खत्म कर दिया गया. यानी जितनी जरूरत उतना आयात संभव हुआ. आयात पर टैक्स में कमी की गई. संवेदनशील उत्पादों को छोड़कर इम्पोर्ट के लिए लाइसेंसिंग की जरूरत खत्म कर दी गई. निर्यात शुल्क हटाने से भारतीय उत्पाद दूसरे देशों में भेजने में आसानी हुई.



डॉ. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों में एक और अहम पड़ाव था निजीकरण. सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों और औद्योगिक इकाइयों का निजी क्षेत्र को हस्तांतरण शुरू हुआ. इससे वित्तीय अनुशासन बेहतर करने में मदद मिली. आधुनिकीकरण भी परवान चढ़ने लगा. निजीकरण से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बढ़ा. विनिवेश को बढ़ावा दिया गया. यानी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की इक्विटी को जनता को बेचा गया. इससे हासिल धन का इस्तेमाल नई परिसंपत्तियों को बनाने के बजाय सरकारी राजस्व की कमी को दूर करने के लिए किया गया



डॉ. मनमोहन सिंह ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के 15वें गवर्नर के रूप में भी कई बड़े फैसले लिए. उन्हीं के कार्यकाल में बैंकिंग के क्षेत्र में कई बड़े कानूनी सुधार किए गए. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट में नए चैप्टर की शुरुआत की गई. अर्बन बैंक्स डिपार्टमेंट बनाया गया. यही नहीं, 1982 से 1985 के बीच डॉ. मनमोहन सिंह ने केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में कई गंभीर आर्थिक नीति से जुड़े मामलों में सरकार को सलाह दी. इससे पहले साल 1976 से 1980 के बीच वाणिज्य मंत्रालय में सचिव के रूप में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी कई समस्याओं को निपटाने में देश की मदद की थी.



डॉ. मनमोहन सिंह साल 2004 से 2014 तक 10 साल प्रधानमंत्री रहे और देश के भविष्य के लिए दूर की सोची. ऊर्जा संकट को खत्म करने के लिए परमाणु समझौता हो या फिर समाज कल्याण के लिए शुरू किया गया नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (नरेगा), सबने देश की तरक्की में अपनी-अपनी भूमिका निभाई. नरेगा को ही आज मनरेगा के नाम से जाना जाता है. सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार कानून भी उन्हीं की देन हैं.

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