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कैबिनेट से मंजूरी के बावजूद झारखंड में साहित्य, ललित कला और संगीत नाटक अकादमी का गठन अधर में

Chikheang 3 hour(s) ago views 340
  

साहित्य, संगीत-नाटक व ललित कला अकादमी गठन की लंबे समय से होती रही है मांग।



जागरण संवाददाता, रांची। राज्य ने अपना 25 वां धूमधाम से मनाया है। इन 25 सालों में लेखक-कलाकार-रंगकर्मी अकादमी गठन की मांग करते आ रहे हैं। लंबे समय के बाद पिछले साल राज्य सरकार ने कैबिनेट में गठन की मंजूरी भी दे दी, लेकिन ढाई महीने बाद भी कहीं से कोई सुगबुगाहट नहीं है। सरकार ने अभी तक गठन नहीं किया है। सो, सभी लोग सरकार से आस लगाए हैं।

गठन हो जाने से यहां के लेखकों-कलाकारों-रंगकर्मियों को लाभ तो होता ही है, राज्य की छवि भी देश में बनती। किसी भी राज्य की पहचान विकास से नहीं होता है। असल पहचान, कला, संस्कृति-रंगकर्म-लेखन से ही होता है।

झारखंड के पास हजारों साल पुरानी लोक कलाएं, हजारों साल पुरानी भाषाएं और संस्कृति है। इन मौखिक परंपराओं को हम लिपिबद्ध कर सकते हैं। यह सब अकादमी के द्वारा ही संभव हो पाएगा। शहर के सांस्कृतिक अगुवा ने अपने विचार रखे हैं।

तकरीबन 26 साल पहले जिन उद्देश्यों को लेकर झारखंड राज्य की स्थापना हुई थी, उसमें सबसे महत्वपूर्ण था सांस्कृतिक मूल्य और उनका संवर्धन और संरक्षण। प्रश्न है कि क्या विकास का मतलब सिर्फ सड़क, फ्लाईओवर और भौतिक विकास है?
अकादमी का गठन अभी भी सपना ही

कथाकार पंकज मित्र कहते हैं- यह बहुत दुखद तथ्य है कि भाषा और संस्कृति के नाम पर पृथक राज्य के लिए आंदोलन हुआ, लेकिन इतने वर्षों के बाद भी भाषा अकादमी, साहित्य अकादमी, ललित कलाओं, संगीत नाटक अकादमी का गठन अभी भी एक दूरस्थ सपना ही है। साहित्य और कला से जुड़े लोगों के द्वारा काफी प्रयास करने के बाद भी शासन की इच्छा शक्ति का अभाव दिखता है।

हालांकि कैबिनेट मंजूरी हुई परंतु लंबा समय बीत जाने के बाद भी इनका गठन नहीं हो पाया है। भाषा विशेष रूप से जनजातीय भाषाओं का संवर्धन और संरक्षण अटका पड़ा है। साहित्यकार कलाकार प्रोत्साहन के अभाव में निराशा का सामना कर रहे हैं। जितनी जल्दी इन अकादमियों का गठन होगा निराशा दूर होगी।
कलाकारों की प्रतिभा दब सी गई

रंगकर्मी संजय लाल का कहना है कि झारखंड गठन के 25 साल बाद भी साहित्य, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने वाली अकादमियों का गठन नहीं हो पाया है। साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के अभाव में कलाकारों की प्रतिभा दब सी गई है। इन अकादमियों से रंगमंच, चित्रकला, लोक नृत्य और शास्त्रीय संगीत को गति मिलती।

स्थानीय कलाकारों को पहचान मिलती, युवा प्रेरित होते और झारखंड की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होती। अपने यहां राष्ट्रीय स्तर के रंगकर्मी हैं, लेकिन हम मंच नहीं दे पा रहे हैं। अकादमी गठन से संभव हो पाएगा। सरकार से हम उम्मीद करते हैं कि इस दिशा में जल्द कदम बढ़ाए।


तीनों अकादमियों का गठन जल्द हो

विश्वप्रसिद्ध हमारे राज्य में बेहद समृद्ध भाषाई-साहित्यिक-कलात्मक परंपरा रही है। योग्यता का सम्मान, लोकगीत-लोक कथाओं, लोक कलाओं, सदियों पुराने भित्ति चित्रों का संवर्धन, विकास यह सभी अकादमी गठन से ही संभव होगा। साहित्यिक-कलात्मक-संगीतात्मक कार्यों का व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच, राज्य के वाचिक साहित्य को सहजता से सामने लाना, कृतियों को सम्मानित-पुरस्कृत करना, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा यह तभी संभव है, जब एक मंच बने। पत्रिका, पुस्तकों का प्रकाशन और \“अनुवाद\“ से व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंच। श्रव्य-दृश्य प्रारूपों में संग्रहण और वितरण और विविध सम्मेलनों, कार्यक्रमों, संगोष्ठियों के माध्यम से यहां की कला-संस्कृति-साहित्य का व्यापक प्रचार-प्रसार संभव होगा। तीनों अकादमियों के गठन से ही यह संभव होगा और सरकार को अब आगे बढ़ना चाहिए।
- अनिता रश्मि, सुप्रसिद्ध लेखिका
कला क्षेत्र उपेक्षित है


संगीत नाटक अकादमी का अब तक गठन नहीं होना अत्यंत निराशाजनक है। राज्य गठन के 25 वर्षों के पश्चात् भी यह क्षेत्र उपेक्षित है। स्थानीय संगीतकार राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर राज्य का प्रतिनिधित्व तथा प्रदर्शन करने के अवसर से वंचित होते जा रहे हैं। संगीत में व्यक्त विविध संस्कृति की विशाल अमूर्त विरासत को सुरक्षित रखने, प्राचीन विधाओं को संरक्षित करने, प्रदर्शन कलाओं को बढ़ावा देने, पुरस्कारों एवं छात्रवृत्तियों के माध्यम से संगीतकारों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ सर्वोपरि उन्हें मान्यता देने एवं व्यापक सांस्कृतिक विकास हेतु संगीत नाटक अकादमी का गठन नितांत आवश्यक है।
-देवप्रिय ठाकुर, गायक-वादक

प्रदेश की भाषा-संस्कृति का संरक्षण हो सकेगा

झारखंड साहित्य अकादमी स्थापना संघर्ष समिति के अध्यक्ष शिरोमणि महतो कहते हैं, झारखंड राज्य की मौलिक पहचान इसकी भाषा संस्कृति है। बावजूद इसके राज्य स्थापना के 25 वर्षों बाद भी यहां अकादमियों का गठन न हो सका।

झारखंड राज्य साहित्य अकादमी स्थापना सन्घर्ष समिति के विगत पांच वर्षों के अथक प्रयास क बाद वर्तमान सरकार ने झारखंड राज्य साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी के गठन का निर्णय लिया, किंतु कैबिनेट की स्वीकृति के छह माह बाद भी इनके गठन की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं हुई है।

यदि प्रदेश में इन अकादमियों का गठन हो जाता है तो प्रदेश की भाषा-संस्कृति के संरक्षण और उन्नयन के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य हो सकते हैं। सर्वप्रथम यहां के विलुप्त हो रहे लोक गीत, साहित्य, संगीत और कला को संरक्षित, संग्रहित, और संवर्धित करने के लिए सुगमता पूर्वक योजना बनाकर कार्य किया जा सकता है। विलंब न करते हुए राज्य सरकार को अकादमियों के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ कर देनी चाहिए।


आदिवासी संस्कृति संरक्षण के राज्य दायित्वों के विपरीत


झारखंड मंत्रिपरिषद से स्वीकृति मिलने के बावजूद अब तक साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी का गठन नहीं होना गंभीर नीतिगत चूक है। यह स्थिति संविधान की पांचवीं अनुसूची तथा आदिवासी संस्कृति संरक्षण के राज्य दायित्वों के विपरीत है।नागपुरी, खोरठा, कुरमाली, पंचपरगनिया, कुड़ुख, मुंडारी, हो, संताली व खड़िया जैसी भाषाओं और लोक कलाकारों के संरक्षण, शोध, प्रकाशन व आजीविका के लिए अकादमियां अनिवार्य हैं। सरकार को तत्काल गठन, बजट आवंटन और स्वायत्त संचालन सुनिश्चित करना चाहिए।
-डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’, असिस्टेंट प्रोफेसर, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय, रांची यूनिवर्सिटी, रांची।
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