जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह । (विकिपीडिया)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिमी राजस्थान की सामाजिक और राजनीतिक चेतना पर जोधपुर और उसके शाही वंश की विरासत का दबदबा रहा है। इस विरासत में एक आदमी की छवि बसी हुई हैं और वो हैं बापजी। जो चार साल की उम्र में ही राजा बने और फिर सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से मारवाड़ की आत्मा से गहराई से जुड़ गए।
वह राजनेता तो नहीं है, फिर भी हर चुनाव में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह कहानी है जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह की। जब वे मुश्किल से चार साल के थे, तब उनके पिता की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। तब उन्हें जोधपुर का शासक घोषित किया गया।
उनके जीवन पर आधारित एक किताब, “बापजी: जोधपुर मारवाड़ के महाराजा: वह राजा जो इंसान बना“, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लॉन्च की गई।
NDTV के अनुसार, गज सिंह जी ने बताया, “वह बहुत मुश्किल समय था। मेरी मां ने 1952 में पूरी जिम्मेदारी संभाली। मैं सिर्फ चार साल का था। मुझे याद है कि मुझे मेहरानगढ़ किले ले जाया गया था, जहां मेरा राज्याभिषेक हुआ था। उसके बाद, मैं अपनी पढ़ाई के लिए विदेश चला गया।“
उन्होंने कहा, “जब 1970 के दशक में हमारी प्रिवी पर्स खत्म कर दी गई, तो मेरी मां ने कहा कि परिवार को मेरी जरूरत है। मैं लौट आया। हमारे पास बड़े-बड़े महल और सैकड़ों कर्मचारी थे, लेकिन उन्हें बनाए रखने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे। मैंने सब कुछ फिर से व्यवस्थित किया। आज, भगवान की कृपा से, हमारे होटल और संग्रहालय हमारी आजीविका का साधन हैं और उनके जरिए से हम अपनी विरासत को संरक्षित करने में सक्षम हैं।
विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ, सामाजिक सेवा में शामिल होना, लोगों से जुड़े रहना, और पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र में अपनी भूमिका को मजबूत करना धीरे-धीरे गज सिंह जी की पहचान बन गया। भैरों सिंह शेखावत सरकार के दौरान, उन्हें राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
उनकी पहलों ने अन्य शाही परिवारों को अपने महलों को होटलों में बदलने के लिए प्रेरित किया, जिसे नए राज्य वित्तीय प्रोत्साहनों का समर्थन मिला।
राजस्थान में हेरिटेज टूरिज्म उभरा और बापजी का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ने लगा। मारवाड़ सीटों पर उनका सपोर्ट निर्णायक था, फिर भी गज सिंह जी कभी एक्टिव पॉलिटिक्स में नहीं आए।
उन्होंने कहा, “मैं राज्यसभा का सदस्य रहा हूं, लेकिन मैं खुद को किसी एक पॉलिटिकल पार्टी से नहीं जोड़ना चाहता था। मेरे पिता ने 1952 में आजाद उम्मीदवारों के जरिए मारवाड़ में 31 सीटें जीती थीं। मेरी मां ने भी चुनाव लड़ा था, और उनका नारा था, \“समय बदल गया है, लेकिन रिश्ते नहीं।\“ मुझे पॉलिटिक्स बहुत बांटने वाली लगती है, क्योंकि यह लोगों को अलग-अलग ग्रुप्स में बांट देती है।“
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लॉन्च की गई किताब में शाही परिवार के आर्काइव से दुर्लभ तस्वीरें शामिल हैं, जिनमें से कई पहले कभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं। मुश्किल समय में अपनी विरासत की जिम्मेदारी लेना और उसे ग्लोबल पहचान दिलाना ही “द किंग हू वुड बी मैन“ की सच्ची कहानी है। उन्होंने आखिर में कहा, “आप जो भी करें, पूरे समर्पण के साथ करें। अपनी विरासत को बचाएं और समाज में लीडरशिप की भूमिका निभाएं।“ |