कचरा, जाम और प्रदूषण से मुक्ति के लिए बजट में क्या होगा खास? जागरण ग्राफिक्स- अमन सिंंह।
अरविंद पांडेय,नई दिल्ली। शहरों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2030 तक लगभग 45 प्रतिशत आबादी शहरों में होगी। पर शहर उस हिसाब से उन्नत नहीं हो रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में खासतौर से केंद्र सरकार की नजर तो शहरी व्यवस्था और विकास पर गई है, लेकिन इसके लिए जिस गति और फंड की जरूरत है, वह पूरी नहीं हो रही है। छोटे तो दूर, बड़े व सुविधाओं के हिसाब से कथित उन्नत शहरों में भी शत प्रतिशत साफ पानी और हवा, सीवर सिस्टम, बिजली, बेहतर सार्वजनिक यातायात जैसी मूलभूत सुविधाएं अपर्याप्त हैं। पैदल यात्री तो नजरों से ही ओझल हैं। शहरों के सीमित संसाधनों पर बोझ बढ़ता जा रहा है और उसके लिए दीर्घकालिक उपाय की जगह सिर्फ त्वरित उपाय ढूंढे जा रहे हैं। जरूरी है कि शहरी विकास केंद्र से लेकर राज्य तक के प्राथमिक एजेंडे में शामिल हो। फिलहाल केंद्रीय बजट आने वाला है और उसके बाद राज्यों के बजट पेश होने हैं। इस समय कई योजनाएं चल रही हैं कि है। केंद्र ने लाखों करोड़ रुपये का फंड दिया है, लेकिन नतीजा निराश ही करता है। शहरी विकास वैसे तो राज्य का विषय हैं, लेकिन अकेले राज्यों के भरोसे शहरों को सक्षम नहीं बनाया जा सकता है। ऐसे में शहरी विकास को दो तरीके से देखा जाना चाहिए।
क्या होना चाहिए रोडमैप? कुछ योजनाएं समग्र रूप से चलाई जा सकती हैं, जैसे- पेयजल, सीवर आदि के लिए अमृत योजना चल रही हैं। इसके अलावा, दूसरी विशिष्ट जरूरतों के लिए भी इंतजाम होने चाहिए। छोटे कस्बे से बढ़ रहे शहरों के लिए अनुभवी प्लानर नियुक्त होने चाहिए और तय समय में पूरे देश में 200 ऐसे शहरों के विकास के रोडमैप पर बजट का ध्यान जाना चाहिए।
क्या है इस समय की सबसे बड़ी चुनौती? अमृत मिशन, जल जीवन मिशन या फिर स्मार्ट सिटी मिशन जैसी- योजनाएं सिर्फ कमजोर निगरानी की वजह से जमीनी स्तर पर उतनी कारगर नहीं हो पाई, जितनी योजना शुरू करने के दौरान सोचा गया था। इसके पीछे राज्यों व नगरीय निकायों की वित्तीय स्थिति भी एक बड़ी चुनौती थी। ऐसे बजट में नगरीय निकायों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए भी राह दिखाई जानी चाहिए। राज्यों को केंद्रीय योजनाओं में सक्रियता और अपने तई प्रबंधन के लिए तो तैयार होना ही होगा, लेकिन केंद्र को भी सोच बदलना पड़ेगा।
शहरी विकास की जरूरतें
- शहरी योजना: अमरावती जैसे नए शहरों के विकास की जरूरत, मौजूदा शहरों का योजनाबद्ध विस्तार और बस रहे नए शहर व कस्बों की योजना पर ध्यान देने की जरूरत।
- सार्वजनिक परिवहन: मेट्रो, इलेक्ट्रिक बसों और साइकिल ट्रैक का जाल बिछाया जाए ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो
- जल प्रबंधन: जल संचयन और प्रभावी जल निकासी प्रणाली होनी चाहिए ताकि बाढ़ जैसी स्थिति न बने।
- सस्ते आवास: बढ़ती शहरी आबादी को देखते हुए कम आय समूह वाले सस्ते घरों का निर्माण तेजी से होना चाहिए।
- पर्यावरण उपाय : शहरों के बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए पार्कों व अर्बन फॉरेस्ट का अधिक विकास करना चाहिए। कचरा प्रबंधन पर फोकस होना चाहिए।
- आपदा प्रबंधन: जलवायु परिवर्तन को देखते हुए शहरों को भूकंप, बाद और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने के लिए सक्षम बनाना चाहिए।
शहरी निकायों को दी जाए पूरी स्वायत्तता
शहरी मामलों के विशेषज्ञ हितेश वैद्य कहते हैं- शहरों का विकास तभी संभव है, जब उन्हें पूरी स्वायत्तता दी जाएगी। यानी उन पर ऊपर से कुछ थोपा न जाए, बल्कि उनकी जरूरतें उनसे पूछी जाए और सहयोग दिया जाए। राज्यों को सिटी प्लान की जगह क्लस्टर सिटी प्लान बनाने के लिए बजट में राह दिखाई जानी चाहिए। निकायों के लिए प्रोफेशनल म्युनिसिपल कैडर सृजित किया जाना जाना चाहिए। निकायों के पास समर्पित अपने अधिकारियों का न होना भी इस राह में एक बड़ी बाधा है। जाहिर है कि सभी योजनाओं की सख्त निगरानी, आडिट की जानी चाहिए। साथ ही राज्यों की जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। यह भी पढ़ें- आने वाला है बजट, बड़े शहरों के साथ छोटे-मझोले शहरों को क्या है उम्मीद? |