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पाक्सो मामलों में जीरो टालरेंस! बिहार सरकार ने तय की डेडलाइन, 60 दिनों में चार्जशीट न होने पर एडीजी को रिपोर्ट

LHC0088 1 hour(s) ago views 588
  

सांकेतिक तस्वीर



जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर। बिहार में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों (पाक्सो एक्ट) के मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए विधि विभाग ने जीरो टालरेंस की नीति अपनाई है। हालिया समीक्षा बैठक के बाद विभाग ने पुलिस और अभियोजन पक्ष के लिए कड़े डेडलाइन तय किए गए हैं। बैठक में कड़ा निर्देश दिया गया कि यदि किसी मामले में अनुसंधानकर्ता (आईओ) द्वारा 60 दिनों के भीतर आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल नहीं किया जाता है, तो इसकी सूचना तुरंत अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी), अपराध अनुसंधान विभाग को दी जाएगी।

इसके अलावा एफएसएल रिपोर्ट के कारण लंबित मामलों की सूची भी सीआईडी को भेजने का निर्देश दिया गया है ताकि वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव में न्याय न रुके। पाक्सो एक्ट के प्रावधानों के तहत अब संज्ञान की तिथि से एक वर्ष के भीतर वादों का निष्पादन हर हाल में सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा। सभी विशेष लोक अभियोजकों (एसपीपी) को हर माह कम से कम 10 मामलों को अंतिम निर्णय तक पहुंचाने का लक्ष्य दिया गया है। साथ ही जो केस बयान या बहस के अंतिम चरण में हैं, उनमें तेजी लाने के लिए न्यायालयों से विशेष लिखित अनुरोध किया जाएगा।
अनुपस्थित अभियोजकों पर होगी कार्रवाई

बैठक में अनुशासन को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया गया है। औरंगाबाद, बेगूसराय, गया, सारण और पूर्वी चम्पारण सहित कुल 21 जिलों के विशेष लोक अभियोजक समीक्षा बैठक से अनुपस्थित पाए गए। विभाग ने इन सभी जिलों के अभियोजकों से स्पष्टीकरण मांगने का आदेश दिया है।
पीड़ितों के लिए संवेदनशील माहौल

विभाग ने विशेष रूप से निर्देश दिया है कि अदालती कार्यवाही के दौरान पीड़ितों के साथ अत्यंत सौहार्दपूर्ण वातावरण में और विश्वास जीतकर ही बयान दर्ज कराए जाएं, ताकि उन्हें किसी भी प्रकार के मानसिक दबाव का सामना न करना पड़े। इसके साथ ही पटना द्वारा 54 वादों के निष्पादन की सराहना भी की गई।
गवाही से गायब रहने वाले पुलिसकर्मियों व चिकित्सक रडार पर

समीक्षा बैठक में यह पाया गया कि बार-बार बुलावे के बाद भी अनुसंधानकर्ता (आइओ) और चिकित्सक गवाही के लिए अदालत नहीं पहुंच रहे हैं। जिससे मामलों के निपटारे में देरी हो रही है। निर्देश दिया गया कि यदि कोई अनुसंधान पदाधिकारी दो बार समन मिलने के बाद भी गवाही के लिए उपस्थित नहीं होता है, तो इसकी लिखित शिकायत सीधे संबंधित जिले के एसएसपी से की जाए।

यह सख्ती न केवल वर्तमान अधिकारियों बल्कि उन सेवानिवृत्त जांचकर्ताओं पर भी लागू होगी जो सूचना के बाद भी अदालत नहीं आ रहे हैं। हत्या और दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों की सूची बनाकर उनका ट्रायल प्राथमिकता पर चलाने के लिए न्यायालय से अनुरोध किया जाएगा। इन मामलों को प्रतिदिन अपडेट करना होगा।

विभाग ने कन्टेस्टेड वादों में सजा दिलाने के लिए लोक अभियोजकों की सराहना की, लेकिन साथ ही सजा की दर बढ़ाने का लक्ष्य दिया। जिन मामलों में आरोपित बरी हो रहे हैं, उनकी विस्तृत समीक्षा की जाएगी और ठोस आधार तैयार कर ऊपरी अदालत में अपील की जाएगी।

सभी विशेष लोक अभियोजकों को हर महीने के पहले सप्ताह में अपना डेटा ई-मेल के जरिए निदेशालय को भेजना अनिवार्य कर दिया गया है। निर्देश दिया कि जो मुकदमे अपने अंतिम चरण (बयान, बहस या निर्णय) में हैं, उनका त्वरित निष्पादन सुनिश्चित किया जाए ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।
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