संग्राम सिंह,
वाराणसी। दिल्ली और वाराणसी जैसे शहरों में जब हवा खराब होने की खबर आती है, तो नजरें एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआइ) के आंकड़ों पर टिक जाती हैं। कभी हवा खराब बताई जाती है, कभी बहुत खराब और कभी गंभीर, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये शब्द सचमुच यह बता पाते हैं कि इस हवा को सांस में भरने से लोगों की सेहत और जीवन पर कितना असर पड़ रहा है? काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और आइआइटी दिल्ली के संयुक्त अध्ययन ने इसी भ्रम को तोड़ते हुए साफ कर दिया है कि देश के प्रदूषित शहरों में हवा की गुणवत्ता नापने के लिए इस्तेमाल होने वाला मौजूदा पैमाना एक्यूआइ प्रदूषण का हाल तो बताता है, लेकिन उससे जुड़ा असली स्वास्थ्य खतरा अक्सर ओझल रह जाता है। यह शोध किसी प्रयोगशाला तक सीमित निष्कर्ष नहीं, बल्कि एक साफ चेतावनी है। संदेश स्पष्ट है कि अगर हवा को केवल आंकड़ों और रंगों वाले इंडेक्स में देखकर संतोष कर लिया गया, तो इसकी कीमत लोगों को अपनी सेहत और जीवन से चुकानी पड़ेगी। स्वच्छ पर्यावरण और स्वस्थ समाज के बीच का रिश्ता अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हवा का पैमाना बदलेगा, तभी सेहत की असली तस्वीर सामने आएगी।
बीएचयू के पर्यावरण एवं धारणीय सतत विकास संस्थान के प्रो. आरके मल्ल और आइआइटी दिल्ली के डा. साग्निक डे के संयुक्त शोध में सामने आया है कि देश में अभी जिस तरह एक ही ‘पूल इंडेक्स’ से सभी शहरों की हवा को मापा जा रहा है, वह सेहत के लिहाज से भ्रामक है।
दिल्ली और वाराणसी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। दोनों शहरों की भौगोलिक स्थितियां अलग हैं। आबादी की बनावट अलग है। लोगों की जीवनशैली और पहले से मौजूद बीमारियां भी अलग हैं। इसके बावजूद एक्यूआइ दोनों को एक ही तराजू पर तौलता है। नतीजा यह कि कहीं खतरा बढ़ा-चढ़ाकर दिखता है और कहीं असली जोखिम दब जाता है।
थोड़ा सा प्रदूषण, लेकिन असर गहरा अध्ययन के दौरान दिल्ली में 2013 से 2017 और वाराणसी में 2009 से 2016 तक के वायु प्रदूषण और मृत्यु दर के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। नतीजे चौंकाने वाले हैं। पीएम 2.5 जैसे बेहद महीन कणों में केवल 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी वाराणसी में मृत्यु दर को 0.17 प्रतिशत और दिल्ली में 0.20 प्रतिशत तक बढ़ा देती है। यानी हवा में मामूली गिरावट भी सीधे लोगों की जिंदगी पर असर डाल रही है। यह आंकड़ा इस बात की गवाही है कि प्रदूषण अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर संकट बन चुका है। खतरा यहीं खत्म नहीं होता। शोध में यह भी सामने आया कि ओजोन और नाइट्रोजन डाइआक्साइड जैसे प्रदूषक भी चुपचाप जानलेवा असर डाल रहे हैं। ओजोन के कम स्तर पर भी वाराणसी में मृत्यु दर 2.73 प्रतिशत और दिल्ली में 0.94 प्रतिशत तक बढ़ी, जबकि नाइट्रोजन डाइआक्साइड से यह बढ़ोतरी क्रमशः 1.61 और 0.31 प्रतिशत दर्ज की गई। मौजूदा एक्यूआइ इन प्रदूषकों के स्वास्थ्य प्रभावों को अक्सर उतनी गंभीरता से सामने नहीं लाता, जितनी जरूरत है।
इसलिए जरूरी है नया स्वास्थ्य सूचकांक शोधकर्ताओं का कहना है कि अब समय आ गया है, जब देश को एयर क्वालिटी हेल्थ इंडेक्स (एक्यूएचआइ) को अपनाना चाहिए। यह सूचकांक केवल यह नहीं बताता कि हवा में प्रदूषण कितना है, बल्कि यह सीधे यह दिखाता है कि उस प्रदूषण से किसी खास शहर के लोगों की सेहत और जान को कितना खतरा है। इससे आम लोगों को भी यह समझने में आसानी होगी कि आज की हवा उनके लिए कितनी सुरक्षित है और सरकार को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस इलाके में किस तरह के ठोस कदम तुरंत उठाने जरूरी हैं। पर्यावरण के नजरिये से भी यह बदलाव बेहद अहम है। जब तक स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य से जुड़े भरोसेमंद आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक प्रदूषण से होने वाली मौतों का सही आकलन संभव नहीं है। यही वजह है कि शोध में नान-अटेनमेंट शहरों, यानी उन शहरों पर विशेष जोर दिया गया है, जो लगातार वायु गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। यहां स्वास्थ्य डेटा तक आसान और पारदर्शी पहुंच के बिना नीतियां कागजों से आगे नहीं बढ़ पाएंगी।
डब्ल्यूएचओ के मानकों से कई गुना जहरीली हवा स्थिति की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि दिल्ली और वाराणसी में प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्ल्यूएचओ) के मानकों से कई गुना अधिक है। वाराणसी में पीएम 2.5 का औसत स्तर 110.78 और दिल्ली में 141.58 दर्ज किया गया, जबकि डब्ल्यूएचओ का 24 घंटे का सुरक्षित मानक केवल 15 है। इसका अर्थ है कि दिल्ली की हवा करीब नौ गुना और वाराणसी की हवा सात गुना अधिक जहरीली रही। |
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