ट्रंप की बार-बार धमकी के बावजूद ईरान पर हमला क्यों नहीं करेगा अमेरिका (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप एक बार फिर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं। वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद ट्रंप का हौसला और बढ़ा है। इसी बीच ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों की सबसे बड़ी लहर देखी जा रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका वाकई ईरान पर हमला कर सकता है? पढ़े 5 कारण...
1. ट्रंप के आक्रामक बयानों के बावजूद, अमेरिकी सेना ने अभी तक मिडिल ईस्ट में कोई बड़ी तैनाती नहीं की है। पेंटागन ने न तो कोई एयरक्राफ्ट कैरियर भेजा है और न ही हमले की खुली तैयारी दिखी है। अमेरिका के खाड़ी देश सहयोग भी ईरान पर हमले के लिए अपने यहां अमेरिकी बेस इस्तेमाल करने को लेकर उत्साहित नहीं हैं।
2. विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी हमले ईरान की सरकार को ही फायदा पहुंचा सकता है। इससे ईरानी नेतृत्व आंतरिक विरोध को विदेशी साजिश बताकर दबा सकता है और जनता को अपने पक्ष में कर सकता है।
3. ट्रंप भले ही सैन्य हस्तक्षेप की बात कर रहे हो, लेकिन इलाके में सैन्य संसाधनों की स्थिति कमजोर है। ब्रिटिश अखबार द गार्डियन के मुताबक, हाल के महीनों में अमेरिका ने मिडिल ईस्ट से अपने सैनिक और संसाधन कम किए हैं। अक्टूबर के बाद से अमेरिका का कोई एयरक्राफ्ट कैरियर मिडिल ईस्ट मं तैनात नहीं है।
USS जेराल्ड आर. फोर्ड को कैरेबियन भेज दिया गया है और USS निमित्ज को अमेरिका के पश्चिमी तट पर लाया गया है। अगर हमला होता है तो अमेरिका को कतर, बहरीन, इराक, यूएई, ओमान या सऊदी अरब जैसे देशों के एयरबेस का इस्तेमाल करने की अनुमति लेनी होगी। साथ ही, इन देशों और अमेरिकी ठिकानों को ईरानी जवाबी हमले से बचाना भी बड़ी चुनौती होगी।
4. एक विकल्प जून 2025 में किए गए उस हमले जैसा हो सकता है, जब अमेरिका ने B-2 बॉम्बर्स से रान के फोर्डो परमाणु ठिकाने को निशाना बनाया था। लेकिन घनी आबादी वाले इलाकों में ऐसा हमला भारी जान-माल के नुकसान का कारण भी बन सकता है।
5. ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह अमेरिकी ठिकानों और जहाजों को निशाना बनाएगा, चाहे वे कहीं भी हों। हालांकि, इजरायल के साथ हुए 12 दिन के युद्ध में ईरान की सैन्य ताकत को नुकसान पहुंचा था, लेकिन उसके पास अब भी सीमित मिसाइल क्षमता मौजूद है।
ईरान दोबारा तैयार कर रहा मिसाइल लॉन्चिंग ठिकाने
रिपोर्टस के मुताबिक, ईरान के कई मिसाइल लॉन्चिंग ठिकाने पहाड़ों के भीतर बने हैं और उन्हें दोबारा तैयार किया जा रहा । द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास करीब 2000 भारी बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। अगर इन्हें बड़ी संख्या में दागा गया, तो ये अमेरिका और इजरायल की एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती हैं। इस वजह से अमेरिका के लिए हमला करना सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक जोखिम भी बन सकता है।
एक और बड़ी दिक्कत है कि हमले के लक्ष्य तय करना। ईरान में विरोध प्रदर्शन पूरे देश में फैले हुए हैं, ऐसे में सिर्फ सैन्य ठिकानों को अलग करना आसान नहीं है। गलत निशाने और नागरिकों की मौत का खतरा हमेशा बन रहेगा, खासकर शहरी इलाकों में। इससे अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा हमला ईरानी सरकार को और मजबूत कर सकता है, क्योंकि वह इसे विदेशी दखल बताकर जनता को एकजुट कर सकती है। ईरान में अमेरिका के दखल का इतिहास 1953 के तख्तापलट तक जाता है। ऐसे में किसी भी हमले को सरकार जनता के सामने पुराने जख्म कुरेदने के तौर पर पेश कर सकती है।
रॉयल यूनाइटेडसर्विसेज इंस्टिट्यूट की विशेषज्ञ रोक्सेन फारमनफरमैयन के मुताबिक, ईरान की सरकार और सुरक्षा तंत्र भी भी संगठित और मजबूत हैं। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी कीमत पर सड़कों और सीमाओं पर नियंत्रण बनाए रखना चाहती है और बड़ी संख्या में हुई मौतें इसी दृढ़ता को दिखाती है।
खामेनेई के पास क्या है विकल्प?
अमेरिका अगर सीधे सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई पर हमला करता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून के लिहाज से गंभीर सवाल खड़े करेगा। ऐसा कदम लंबे समय तक चलने वाले सैन्य टकराव को जन्म दे सकता है। इसके अलावा, इससे ईरान में सत्ता परिवर्तन की गारंटी भी नहीं है। खामेनेई पहले ही अपने संभावित उत्तराधिकारियों की सूची तैयार कर चुके हैं, ऐसे में नेतृत्व खत्म होने से शासन खत्म हो यह जरूरी नहीं।
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