सुप्रीम कोर्ट। (फाइल)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के बच्चों को शिक्षा में प्रवेश देना “राष्ट्रीय मिशन\“\“ होना चाहिए। कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे निजी गैर-अल्पसंख्यक, अनुदान-रहित स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण के प्रविधान को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए स्पष्ट नियम और विनियम तैयार करें।
न्यायमूर्ति पीएम नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी के बच्चों को प्रवेश देना संबंधित सरकार और स्थानीय प्राधिकरण का दायित्व है। साथ ही, अदालतों को भी ऐसे मामलों में अभिभावकों को त्वरित और प्रभावी राहत देने के लिए “एक कदम अतिरिक्त\“\“ चलना चाहिए।
पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक व्यक्ति ने शिकायत की थी कि 2016 में सीटें उपलब्ध होने के बावजूद उसके बच्चों को पड़ोस के स्कूल में आरटीई के तहत मुफ्त शिक्षा में प्रवेश नहीं मिला।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑनलाइन प्रक्रिया का पालन न करने के आधार पर याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऑनलाइन आवेदन प्रणाली, डिजिटल निरक्षरता, भाषा बाधा, हेल्पडेस्क की कमी, सीटों की जानकारी का अभाव और शिकायत निवारण व्यवस्था की अस्पष्टता जैसे कारणों से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित सीटें व्यवहार में पहुंच से बाहर हो जाती हैं।
अदालत ने कहा कि स्पष्ट और बाध्यकारी नियमों के बिना संविधान के अनुच्छेद 21ए (शिक्षा का अधिकार) और आरटीई अधिनियम की धारा 12(1)(स) का उद्देश्य निष्प्रभावी रह जाएगा। इसलिए, धारा 38 के तहत एनसीपीसीआर, राज्य बाल अधिकार आयोगों और सलाहकार परिषदों से परामर्श कर नियम बनाए जाएं।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ) |