मानना कठिन है कि 80 वर्ष की उम्र पार कर चुके लोग फावड़ा उठाकर ये सारे काम कर रहे होंगे (फोटो: पीटीआई)
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में फर्जीवाड़े की गजब कहानी सामने आई है। लगभग पांच लाख ऐसे श्रमिकों के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट होती रही, जिनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक है। मनरेगा के तहत कराए जाने वाले सभी कार्य कठिन शारीरिक श्रम वाले होते हैं, जैसे मिट्टी की खुदाई, तालाबों, पोखरों, कच्ची सड़कों का निर्माण और मेड़बंदी।
ऐसे में यह मानना कठिन है कि 80 वर्ष की उम्र पार कर चुके लोग फावड़ा उठाकर ये सारे काम कर रहे होंगे। स्पष्ट है कि बुजुर्गों के नाम का इस्तेमाल काम कराने के लिए नहीं, बल्कि सरकारी पैसे निकालने के लिए किया गया। ग्रामीण विकास मंत्रालय की जांच में कई मामलों में ऐसे लोगों के नाम भी दर्ज मिले हैं, जिनकी कार्यक्षमता वर्षों पहले समाप्त हो चुकी है या जिनकी मृत्यु हो चुकी है।
6.50 करोड़ से अधिक लोग पंजीकृत
देशभर में मनरेगा के तहत 6.50 करोड़ से अधिक लोग पंजीकृत हैं। इनमें 61 वर्ष से ऊपर के श्रमिकों की संख्या एक करोड़ से अधिक है। यानी कुल पंजीकृत कामगारों का लगभग 15.6 प्रतिशत हिस्सा ऐसे लोगों का है, जिनकी उम्र सामान्य तौर पर कठिन शारीरिक श्रम के अनुकूल नहीं मानी जाती। हैरत तब होती है, जब 80 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों को भी श्रमिक के रूप में दर्ज पाया गया। सवाल यह है कि इनसे किस तरह का काम कराया गया होगा।
वास्तविकता यही है कि फर्जी जॉब कार्ड, नाममात्र की हाजिरी और बनावटी मस्टर रोल के सहारे सरकारी राशि निकाल ली गई। राज्यवार आंकड़े इस गड़बड़ी की गहराई को और उजागर करते हैं। केरल में कुल मनरेगा श्रमिकों में 61 वर्ष से अधिक उम्र वालों की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत तो तेलंगाना में यह 30 प्रतिशत से अधिक है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, पुड्डुचेरी, गोवा, लद्दाख, मणिपुर, नगालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों में भी 61 से 80 वर्ष आयु वर्ग के श्रमिकों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से अधिक है।
80 वर्ष से ऊपर के श्रमिकों के आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। आंध्र प्रदेश में ऐसे श्रमिकों की संख्या 1,22, 902 और तेलंगाना में 1,22,121 है। तमिलनाडु में 58,976, राजस्थान में 36,119, पंजाब में 17,683, केरल में 16,208, मध्य प्रदेश में 15,023 और महाराष्ट्र में 12,039 श्रमिकों की उम्र 80 वर्ष से ज्यादा दिखाई गई है। यह महज डाटा एंट्री की चूक नहीं हो सकती, बल्कि लंबे समय से चल रहा संगठित खेल है। रोजगार सेवकों, तकनीकी सहायकों और स्थानीय प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत से फर्जी नामों पर काम दिखाया गया।
जरूरतमंद काम मांगते रहे, कागजों में बुजुर्गों काम करते रहे
बाद के वर्षों में भुगतान को आधार और बैंक खातों से जोड़कर पारदर्शिता लाने की कोशिश जरूर की गई, लेकिन जमीनी स्तर पर सत्यापन की कमजोरी बनी रही। उम्र और कार्यक्षमता की जांच औपचारिकता बनकर रह गई। मस्टर रोल और भुगतान प्रक्रिया की वास्तविक निगरानी न होने से फर्जीवाड़ा बेरोकटोक चलता रहा।
इसका सीधा नुकसान उन गरीब और सक्षम मजदूरों को हुआ, जिनके लिए मनरेगा बनाई गई थी। जरूरतमंद लोग काम की मांग करते रहे, जबकि कागजों में बुजुर्गों से काम कराया जाता रहा। यह केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि योजना के मूल उद्देश्य के साथ गंभीर खिलवाड़ भी है।
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