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अमृतसर में आवारा कुत्तों का आतंक, नसबंदी अभियान भी धीमा; क्या SC के फैसले से बदलेगी सूरत?

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आवारा कुत्तों का शिकार लोगों के जख्म पर लगेगा मरहम



नितिन धीमान, अमृतसर। सुप्रीम कोर्ट का सराहनीय निर्णय उन लोगों के लिए सुखद है जो आवारा कुत्तों का शिकार बन रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कुत्ते के काटने पर मुआवजा देने का आदेश दिया है। आदेश में कहा गया है कि यदि कोई बच्चा या बुजुर्ग कुत्ते के काटने से जख्मी हो जाता है या उसकी मौत हो जाती है, तो राज्य सरकारें उसे मुआवजा देगी। हालांकि पंजाब में कुत्तों का शिकार बने लोगों को मुआवजे का प्रविधान पहले से ही है, पर लोग इससे अनभिज्ञ हैं। यही कारण है कि कुत्ते के काटने के बाद मुआवजा राशि के लिए लोग प्रशासन तक पहुंच नहीं कर पाते।  

दरअसल, अमृतसर में आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नगर निगम की ओर से नसबंदी अभियान चलाया गया है, पर यह कछुआ चाल चल रहा है। कुत्तों के काटने की गति इतनी है कि प्रतिदिन 100 से अधिक लोग सरकारी अस्पतालों में एंटी रैबीज इंजेक्शन लगवाने पहुंच रहे हैं। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि अस्पतालों में वैक्सीन की भी किल्लत महसूस की जा रही है। न तो कुत्तों की नसबंदी अभियान में कोई खास प्रगति हुई है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों से इन कुत्तों का शहरी इलाकों में आना रुका है।
सिविल अस्पताल की ओपीडी में सुबह से ही लंबी लाइनें लग रही हैं। अधिकतर लोग हाथ या पैर पर पट्टी बंधवाए इंजेक्शन लगवाने पहुंचते हैं। इनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल हैं।  

नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे नसबंदी अभियान की हालत भी चिंताजनक है। प्रतिदिन पचास कुत्तों की नसबंदी का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि औसतन 25 से 30 ही कुत्तों की नसबंदी हो रही है। निगम अधिकारी इस स्थिति के लिए संसाधनों की कमी और निजी एजेंसियों की निष्क्रियता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में कोई भी नसबंदी कार्यक्रम नहीं चल रहा है, जिससे वहां कुत्तों की आबादी अनियंत्रित हो रही है। यही कुत्ते बाद में भोजन की तलाश में शहर में प्रवेश करते हैं और आक्रामक हो जाते हैं।  

शहर के कई स्कूलों ने निगम को पत्र लिखकर शिकायत की है कि कुत्तों के डर से बच्चे स्कूल आना बंद कर रहे हैं। सुबह-सुबह जब बच्चे घर के बाहर खड़े होकर बस अथवा आटो की प्रतीक्षा करते हैं तो कई बार कुत्ते भौंकते हैं। पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डा. स्वर्ण सिंह के अनुसार शहर में कुत्तों की बढ़ती संख्या के लिए असंतुलित शहरीकरण और खुले में पड़ा कचरा भी जिम्मेदार है। जब तक निगम ठोस नीति के तहत सख्त कदम नहीं उठाएगा, समस्या गंभीर होती जाएगी। समस्या को हल करने के लिए जरूरी है कि नसबंदी अभियान को गति दी जाए और ग्रामीण क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया जाए।

साथ ही, एंटी रैबीज वैक्सीन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। निगम को चाहिए कि वह हाटस्पाट चिन्हित कर कुत्तों की धरपकड़ बढ़ाएं। आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं अब स्वास्थ्य संकट का रूप लेती जा रही हैं। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति हाथ से निकल सकती है। प्रशासन, निगम और आम जनता—तीनों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा, तभी इस भय से मुक्ति मिल सकेगी।


वर्ष (Year)कुत्तों के काटने की संख्या (Number of Dog Bites)
$2020$$11,243$
$2021$$13,222$
$2022$$17,504$
$2023$$18,211$
$2024$$29,500$
$2025$$40,654$



कलेजा चीर देती हैं ये घटनाएं

2015 में मानांवाला में पंजाब रोडवेज के ड्राइवर सुबेग सिंह पर आवारा कुत्ते टूट पड़े। पूरी रात उसे नोचते रहे, सुबह शव मिला था।
2018 में अजनाला के तीन वर्षीय बच्चे अंगदबीर को आवारा कुत्तों के झुंड ने काट काट कर मौत की आगोश में पहुंचा दिया।
2020 में गांव वरपाल के घर के बाहर खेल रहे दो वर्षीय गुरशान दीप को आवारा कुत्तों ने नोच नोच कर मार डाला था।
2022 में मजीठा के गांव भदोई में आवारा कुत्तों ने नौ वर्षीय अर्श को बुरी तरह नोंच दिया।
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