नवीन नवाज, श्रीनगर। सदियों से अध्यात्मक और ज्ञान के केंद्र कश्मीर में आकर स्वामी विवेकानंद को जो अनुभूति हुई, उसके बाद उन्होंने स्वयं कहा था कि यह तो योगियों, तपस्वियों की भूमि है।
उन्होंने मां क्षीर भवानी की एक सप्ताह तक आराधना की। वह श्री अमरेश्वर धाम (अरमनाथ यात्रा) भी गए, जहां उन्होंने भगवान महादेव का अनुभव किया और स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक चेतना और गहरी हो गई।
वह झेलम में एक मुस्लिम के हाउसबोट में भी ठहरे थे और उसकी पुत्री को वह मां देवी का स्वरूप मानकर प्रतिदिन उसकी पूजा करते और उसके चरण पखारते। उन्होंने क्षीर भवानी में एक कश्मीरी हिंदू की पुत्री का भी एक सप्ताह तक उमा पूजन किया। कश्मीर एकमात्र ऐसा स्थान था।
\“धरती का स्वर्ग छोड़ते हुए हो रहा दुख\“
अमनराथ यात्रा पर भी गए स्वामी विवेकानंद, जिसका मोह दुनिया में वेदांत की चेतना जगाने वाला यह योगी भी नहीं त्याग पाया और उन्होंने शिष्या सिस्टर निवेदिता से कहा था कि मुझे कभी भी किसी स्थान को छोड़ते हुए दुख नहीं हुआ जो कश्मीर...धरती के स्वर्ग छोड़ते हो रहा है। स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनकी यात्राओं का वर्णन कश्मीर के बिना अधूरा है।
कश्मीर ने उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व और दिव्य दृष्टि को एक नयी दिशा दी। वह कश्मीर में दो बार आए। उन्होंने कश्मीर में अपना मठ स्थापित करने की इच्छा भी व्यक्त की, लेकिन तत्कालिक परिस्थितयों में वह पूर्ण न हो सकी।
उसका एक कारण-उनका सनातन सभ्यता-संस्कृति के प्रति अटूट विश्वास था, जो शायद उस समय कश्मीर में तैनात ब्रिटिश रेजीडेंट को पसंद नहीं था और उन्हें मठ के लिए जमीन नहीं मिली। इसका उल्लेख स्वामी निखिलानंद द्वारा लिखित-विवेकानंद-ए बायोग्राफी में है।
श्री अमरनाथ सहित कई धार्मिक स्थालों का किया दौरा
स्वामी विवेकानंद कश्मीर की पहली यात्रा पर 10 सितंबर 1897 को आए और आठ अक्टूबर 1987 को बारामुला के रास्ते मरी और फिर रावलपिंडी पहुंचे। अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने कश्मीर के विभिन्न लोगों, साधुओं-विद्वानों, छात्रों और तत्कालीन डोगरा शासक व उनके अधिकारियों से भी मुलाकात की।
उन्हें कश्मीर इतना भाया कि वह जून 1898 को पुन: कश्मीर की धरती पर लौटे। इस बार उनके साथ सिस्टर निवेदिता और उनके अन्य यूरोपीय शिष्य भी थे। उनकी इस यात्रा ने कश्मीर और कश्मीर के शैव दर्शन, कश्मीर में देवी पूजा की परंपरा व दर्शन को लेकर उनके विचारों पर गहन प्रभाव डाला।
उन्होंने गोपाद्री पर्वत पर स्थित शंकराचार्य मंदिर, हारि पर्वत, मार्तंड मंदिर, पंद्रेठन (पांडवों का स्थान), अवंतीपोरा, बिजबिहाड़ा के मंदिर, जैसी धार्मिक स्थानों का दौरा किया। वह मां क्षीर भवानी (जिन्हें खीर भवानी और मां राघेन्या भी कहा जाता है) के मंदिर भी गए। वह श्री अमरनाथ में हिमलिंग स्वरूप में विराजमान भगवान शिव के दर्शन करने भी गए।
27 जुलाई को तीर्थयात्रा पर हुए रवाना
एक कश्मीरी पंडित की छोटी बेटी की पूजा करते थे स्वामी विवेकानंद की भगवान शिव में बहुत आस्था थी। जब वह कश्मीर आए तो उन्होंने श्री अमरनाथ यात्रा का निश्चय किया और 27 जुलाई 1898 को सिस्टर निवेदिता संग तीर्थयात्रा पर रवाना हुए। शिवभक्ति की भावना से परिपूर्ण स्वामी विवेकानंद दो अगस्त को अमरनाथ पहुंचे।
उन्होंने सिस्टर निवेदिता को बाहर रहने को कहा और स्वयं भीतर दाखिल हुए। बताया जाता है कि उनके शरीर पर सिर्फ लंगोटी थी और कुछ लोगों के मुताबिक उन्होंने मृगचर्म पहन रखा था।
पवित्र गुफा में उन्होंने जो अनुभव किया, उसके बारे में उन्होंने कहा कि मुझे लगा कि बर्फ का लिंग खुद शिव हैं। इस अनुभव ने उन पर एक गहरी छाप छोड़ी। इसके बाद वह अनंतनाग लौटे और आठ अगस्त 1898 को नाव के जरिए श्रीनगर पहुंचे।
मां को खीर का लगाते थे भोग
वह झेलम दरिया में एक मुस्लिम के हाउसबोट में रुके। वह उसकी चार वर्षीय पुत्र की देवी उमा के रूप में पूजा करते थे। स्वामी विवेकानंद 30 सितंबर को श्रीनगर से तुलमुला स्थित माता क्षीर भवानी मंदिर के लिए निकले और उन्होंने अपने साथियों को अपने पीछे आने से मना किया।
वह एक सप्ताह तक वहीं रहे और वहां प्रतिदिन हवन करते, मां को खीर का भोग लगाते। इसके बाद वह एक कश्मीरी पंडित की छोटी बेटी की उमा कुमारी के रूप में पूजा करते थे।
एक दिन पूजा करते समय स्वामी विवेकानंद को खीर भवानी मंदिर को मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नुकसान पहुंचाने पर क्रोध आया। उन्होंने सोचा कि माता यहां अनगिनत वर्षों से है। स्थानीय लोगों ने प्रतिरोध क्यों नहीं किया। मैं कभी ऐसा नहीं होने देता। |
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