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बुलंदशहर में खून की कमी से जूझ रहीं 25% गर्भवती महिलाएं, प्रसव के दौरान हो रही परेशानी, इस लापरवाही से बढ़ सकती है दिक्कत

cy520520 2026-1-11 15:56:35 views 422
  



जागरण संवाददाता, बुलंदशहर। जिले की अधिकांश गर्भवती महिलाएं खून की कमी से जूझ रहीं हैं। पिछले तीन महीने में जिला महिला अस्पताल की ओपीडी में आने वालों गर्भवतियों में से 25 प्रतिशत में सात से दस ग्राम प्रति डेसीलीटर खून पाया जा रहा है। प्रसव के समय खून चढ़ाना पड़ रहा है। साथ ही खून की कमी वाली गर्भवतियों के शिशु भी कुपोषण का शिकार हो रहे हैं।

जिला महिला अस्पताल में 109 ऐसी गर्भवती महिलाएं आईं, जिनका खून सात ग्राम प्रति डेसीलीटर से भी कम था। खून की कमी की वजह से शिशु कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। लगभग जिला महिला अस्पताल से लेकर सीएचसी तक पर आने वाले 115 बच्चों का वजन ढ़ाई किलो से भी कम रहा, जबकि स्वस्थ बच्चे का वजन ढाई किलो से ऊपर माना जाता है।

स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक 21 सितंबर से 20 दिसंबर तक तीन महीने में ओपीडी में आने वाली 7053 महिलाओं में से 1667 महिलाएं एनीमिक पाई गई। इनमें 109 महिलाएं ऐसी थी, जिनका हीमोग्लोबिन सात ग्राम से भी कम था। जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डा. अजय पटेल ने बताया कि अस्पताल आ रही गर्भवतियों में से 25 प्रतिशत महिलाओं में सात से दस ग्राम प्रति डेसीलीटर खून पाया जाता है, जबकि सामान्य तौर पर दस ग्राम या इससे अधिक होना चाहिए। आयरन की गोली खाने में लापरवाही गर्भवतियों पर भारी पड़ रही है।

रक्त की कमी के लक्षण

थकान, कमजोरी, शरीर का पीला पड़ना, दिल की धड़कन का सामान्य न होना, सांस लेने में तकलीफ, चक्कर आना, सीने में दर्द, हाथों और पैरों का ठंडा होना एवं सिरदर्द है।

खून की कमी से होने वाली परेशानी

शरीर में खून की कमी से आलस्य बने रहना, चिड़चिड़ापन, नींद अधिक आना, कार्य में मन न लगना जैसी परेशानी होती है।

महिलाओं को चढ़ाया खून

जिला महिला अस्पताल में हर माह 20 से अधिक महिलाओं को खून चढ़ाया जाता है। इन महिलाओं का होमोग्लोबिन नौ ग्राम प्रति डेसीलीटर से कम था। चिकित्सकों का कहना है कि हीमोग्लोबिन कम होने से प्रसव के समय हैवी ब्लीडिंग की आशंका बढ़ जाती है, क्योंकि खून में धक्का जमने की क्षमता कम हो जाती है। कई बार जिंदगी के लिए भी खतरा पैदा हो जाता है। ऐसे में सुरक्षित प्रसव के लिए खून चढ़ाना आवश्यक हो गया था।

16 बच्चों का वजन 1800 ग्राम से भी कम
तीन महीने में जिला महिला अस्पताल में होने वाले प्रसव में 115 ऐसे शिशु पैदा हुए, जिनका वजन ढाई किलो से भी कम था। साथ ही 16 ऐसे बच्चे पैदा हुए, जिनका वजन 1800 ग्राम से भी कम था। चिकित्सकों के अनुसार ऐसे बच्चों की मृत्युदर ज्यादा होती है। शरीर के अंग सही से विकसित नहीं होते और रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। ऐसे बच्चों को कंगारु मदर केयर थैरेपी दिलवाई जा रही है।



मेडिकल कालेज में प्रतिमाह औसतन लगभग तीन सौ प्रसव होते हैं। इनमें सौ शिशुओं का जन्म आपरेशन के बाद होता है। गर्भावस्था में अक्सर खून की कमी हो जाती है। इसलिए तीन महीने को गर्भावस्था के बाद आयरन की गोलियां दी जाती हैं, लेकिन लापरवाह महिलाओं का हीमोग्लोबिन कम हो जाता है। ओपीडी में महिलाओं को जागरुक किया जाता है कि आयरन की गोली के अलावा खजूर, गुड़, हरी पत्तेदार सब्जी के सेवन के अलावा लोहे की कढ़ाई में सब्जी बनाने की सलाह दी जाती है। -डॉ. पीके झा, मीडिया प्रभारी मेडिकल कॉलेज

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