कारों में फिजिकल बटन की वापसी।
ऑटो डेस्क, नई दिल्ली। पिछले लगभग दस सालों में कारों के इंटीरियर का चेहरा पूरी तरह बदल गया। पहले जहां डैशबोर्ड पर एसी, म्यूजिक, वाइपर और लाइट्स के लिए अलग-अलग बटन और नॉब्स होते थे, वहीं अब लगभग सब कुछ एक बड़ी टचस्क्रीन में समेट दिया गया। इसे आधुनिकता और प्रीमियम फील से जोड़ा गया। लेकिन अब यही ट्रेंड उलटता दिख रहा है। 2025–26 तक कई बड़ी कार कंपनियां फिर से फिजिकल बटन और नॉब्स को वापस ला रही हैं। इसमें Volkswagen, Hyundai और Mercedes-Benz जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। यह बदलाव किसी पुराने जमाने की याद या भावनाओं की वजह से नहीं, बल्कि सुरक्षा, नियमों की सख्ती, ग्राहकों के अनुभव और लागत जैसे ठोस कारणों से हो रहा है।
1. सुरक्षा
टचस्क्रीन दिखने में भले ही स्मार्ट लगे, लेकिन ड्राइविंग के दौरान यह एक बड़ी समस्या बन जाती है।
- एसी का तापमान बदलना हो
- वॉल्यूम कम-ज्यादा करना हो
- फैन स्पीड या मोड बदलना हो
तो उसे सड़क से नजर हटाकर स्क्रीन देखनी पड़ती है। कई बार सही आइकन ढूंढने के लिए दो-तीन टैप करने पड़ते हैं। इसके उलट, फिजिकल बटन में मसल मेमोरी काम करती है। ड्राइवर को याद होता है कि कौन-सा बटन कहां है, और वह बिना देखे ही उसे दबा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ सेकेंड का भी ध्यान भटकना एक्सीडेंट के खतरे को काफी बढ़ा देता है। इसी वजह से अब कंपनियां मान रही हैं कि पूरी तरह टचस्क्रीन पर निर्भर डैशबोर्ड सुरक्षा के लिहाज से सही नहीं है।
2. Euro NCAP के सख्त नियम
यूरोप की प्रमुख कार सेफ्टी एजेंसी Euro NCAP ने साफ संकेत दे दिया है कि 2026 से सेफ्टी को लेकर नियम और कड़े होंगे।
- इंडिकेटर
- वाइपर
- हॉर्न
- इमरजेंसी कॉल
जैसे जरूरी फंक्शंस अगर सिर्फ टचस्क्रीन से ऑपरेट होते हैं, तो ऐसी कार को 5-स्टार सेफ्टी रेटिंग नहीं मिलेगी। यानी अगर कंपनियों को अपनी कारों की सेफ्टी रेटिंग ऊंची रखनी है, तो उन्हें फिजिकल कंट्रोल देना ही होगा। यह कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है। इसी कारण कई ब्रांड अपने इंटीरियर डिजाइन पर दोबारा काम कर रहे हैं।
3. ग्राहकों का अनुभव और नाराजगी
शुरुआत में टचस्क्रीन लोगों को आकर्षक लगी, लेकिन लंबे इस्तेमाल के बाद ग्राहकों की असली परेशानी सामने आई। कई कार कंपनियों के फोकस ग्रुप और कस्टमर फीडबैक में कई चीजें देखने के लिए मिली।
- उबड़-खाबड़ सड़कों पर स्क्रीन टैप करना मुश्किल होता है।
- ड्राइविंग के दौरान बार-बार मेन्यू में जाना झुंझलाहट पैदा करता है।
- साधारण काम के लिए भी ज्यादा ध्यान लगाना पड़ता है।
ग्राहकों का कहना है कि एक साधारण नॉब या स्विच ज्यादा सहज और भरोसेमंद लगता है। यही वजह है कि अब कंपनियां केवल डिजाइन नहीं, बल्कि यूजर एक्सपीरियंस को प्राथमिकता दे रही हैं।
4. रिपेयर कॉस्ट और टिकाऊपन
टचस्क्रीन का एक फायदा यह माना गया कि इससे वायरिंग कम होती है और मैन्युफैक्चरिंग आसान हो जाती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। क्रैक हो जाए, काम करना बंद कर दे या फिर सॉफ्टवेयर से जुड़ी समस्या आ जाए। ऐसी स्थिती में उसका रिपेयर या रिप्लेसमेंट काफी महंगा पड़ता है।
फिजिकल बटन सस्ते होते हैं। जल्दी बदले जा सकते हैं और वर्षों तक बिना खराब हुए काम करते हैं। अब कंपनियां यह समझ रही हैं कि कार सिर्फ नई खरीद के वक्त नहीं, बल्कि पूरे ओनरशिप पीरियड में ग्राहक के लिए किफायती और भरोसेमंद होनी चाहिए।
5. भविष्य का इंटीरियर कैसा होगा?
ऑटो इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक, आने वाले समय में कारों का इंटीरियर ना पूरी तरह टचस्क्रीन-आधारित होगा और ना ही पूरी तरह पुराने जमाने जैसा। अगर बड़ी स्क्रीन दी जाएगी तो नेविगेशन और एंटरटेनमेंट के लिए। ड्राइविंग से जुड़े जरूरी कंट्रोल के लिए फिजिकल बटन और नॉब्स दिए जाएंगे। यानी टेक्नोलॉजी रहेगी, लेकिन वहां जहां वह सुरक्षा और सुविधा दोनों बढ़ाए।
हमारी राय
कारों में फिजिकल बटन की वापसी किसी ट्रेंड का अंत नहीं, बल्कि समझदारी की शुरुआत है। कंपनियां अब यह मान रही हैं कि मॉडर्न दिखना ही काफी नहीं, बल्कि सुरक्षित और आसान इस्तेमाल ज्यादा जरूरी है। आने वाली कारें टेक्नोलॉजी और प्रैक्टिकैलिटी के बीच बेहतर संतुलन बनाकर चलेंगी और यही बदलाव ड्राइवर के लिए सबसे फायदेमंद साबित होगा। |
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