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भारत के अनमोल रतन और उद्यमिता के संत, पढ़ें कैसा था पद्मविभूषण रतन टाटा का जीवन

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  ऐसा था रतन टाटा का जीनव (Picture Courtesy: Instagram )





जागरण न्यूज, नई दिल्ली। जीवन और व्यवसाय में हर स्तर पर मानवीयता और नैतिकता को सर्वोच्च प्राथमिकता एक पंक्ति में परिचय है रतन नवल टाटा का। वे भारत के लिए जिए और अपने जीवन दर्शन से बन गए इसके अनमोल रतन, डा. चंदन शर्मा का स्मृति आलेख…

जीवन में आगे बढ़ने के लिए उतार-चढ़ाव बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ईसीजी में भी एक सीधी रेखा का मतलब है

कि हम जीवित नहीं हैं। रतन टाटा अपने संबोधन में अक्सर यह वाक्य कहा करते थे। यह दर्शन उनके जीवन में



ताउम्र दिखा भी। उन्होंने एक ट्रेनी से टाटा संस के चेयरमैन तक का सफर तय किया। सफलता, असफलता से

परे उन्होंने अपना पूरा जीवन मानव कल्याण में लगा दिया। व्यापार करने वालों के लिए आम धारणा है कि

धंधा करने वाला व्यक्ति सबसे पहले अपना फायदा देखता है और उसके लिए कुछ भी कर सकता है।

रतन नवल टाटा ठीक इसके विपरीत सोचते थे। उन्होंने अपने जीवन और व्यवसाय में हर स्तर पर मानवीयता को



सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यही वजह है कि बुधवार (नौ अक्टूबर) रात उनके निधन के बाद से इंटरनेट मीडिया के

तमाम प्लेटफार्म पर भारत के बेशकीमती रतन को श्रद्धासुमन अर्पित करने की होड़ लग गई। क्या आम और

क्या खास, हर कोई दुखी है। हाल के वर्षों में ऐसा आदर और सम्मान कम ही लोगों को मिला है।

यह भी पढ़ें: यहां पढ़ें Padma Vibhushan Ratan Tata की 5 सबसे महंगी चीजों की लिस्ट



टाटा समूह के कर्मचारी तो उन्हें भगवान ही मानते थे। चेयरमैन होने के बाद जब भी वह जमशेदपुर आते, अपने

साथ काम करने वाले कर्मियों से मिलने पहुंच जाते थे। जूनियर कर्मियों के नाम भी उनको मुंहजुबानी याद रहते

थे। सबके अपने किस्से हैं। सिंहभूम चेंबर आफ कामर्स के पूर्व महासचिव भरत वसानी कहते हैं- तीन बार उनसे

मुलाकात का मौका मिला। उनकी सरलता व विनम्रता बेमिसाल थी। रतन टाटा पहली बार जमशेदपुर 1962 में



कालेज की छुट्टी में आए थे, तब उन्होंने कंपनी ज्वाइन भी नहीं की थी। वहीं आखिरी बार तीन मार्च, 2021 को।

जेआरडी टाटा की जयंती पर संबोधन के दौरान वे भावुक हो गए थे। कहा था, इस बार तो आ गया, अगली बार

कब आऊंगा, पता नहीं। इसके बाद भी इंटरनेट मीडिया पर उनकी पोस्ट से जमशेदपुर का लगाव दिखता रहता

था। इस गुरुवार को जमशेदपुर शहर में मातमी सन्नाटा रहा, हर कोई अपने भगवान को याद कर लेना चाहता



था।

वसानी याद कर कहते हैं- 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में टाटा फाइनेंस की हालत बहुत खराब थी। मेरे

पिता ने उनकी एक जमा योजना में 20,000 रुपये का निवेश किया था। उस समय हमारे लिए यह रकम मायने

रखती थी, लेकिन रतन टाटा ने निर्णय लिया कि कंपनी के समापन से पहले सभी जमाकर्ताओं को भुगतान कर

दिया जाएगा। 2008 की बड़ी मंदी के दौरान अन्य कंपनियां अपने वेंडर्स के प्रति प्रतिबद्धताओं का अनादर कर



रही थीं। वहीं एक वेंडर होने के नाते मैंने व्यक्तिगत रूप से रतन टाटा के फैसले का प्रभाव देखा। टाटा स्टील ने

सभी प्रतिबद्धताओं का सम्मान किया था। कोरोना काल में पूरे देश ने देखा कि टाटा समूह ने अपना खजाना

कैसे मानवता के लिए खोल दिया। रतन टाटा नहीं रहे, किंतु उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को राह दिखाता

रहेगा!
इन चार किस्सों से समझिए उनका जीवन

निर्णय गलत होने पर अफसोस नहीं टाटा स्टील ने 2007 में ब्रिटिश कंपनी कोरस का अधिग्रहण किया। इस



कंपनी को लेने के लिए दुनिया के बड़े-बड़े दिग्गज लगे हुए थे। आर्सेलर मित्तल से लेकर चीन की बड़ी कंपनियां

तक भी कोरस लेना चाह रहीं थीं। इससे नीलामी राशि बढ़ती गई। तब टाटा स्टील ने कई गुणा कीमत में यह सौदा किया। आर्थिक जगत के दिग्गज इसे घाटे का सौदा बता रहे थे। डील होते ही दुनिया मंदी की चपेट में आ

गई। टाटा के लिए यह बड़ा झटका था। मंदी थमने के बाद भी कोरस की परेशानी कम नहीं हुई। ब्रिटेन में



मानव संसाधन के नियमों व लेबर यूनियन के दबावों से लंबे समय तक काम शुरू नहीं हो सका। किंतु रतन हार

मानने वालों में से नहीं थे। आर्थिक स्थिति डंवाडोल हो गई थी। तब टीसीएस से कर्ज लेकर उन्होंने स्टील के

कारोबार को संभाला। इसी अधिग्रहण की बदौलत आज टाटा दुनिया की सबसे बड़ी स्टील उत्पादक कंपनियों में

से एक है। रतन टाटा अक्सर कहते भी थे- मैं सही निर्णय लेने में विश्वास नहीं करता। निर्णय लेता हूं और फिर उन्हें सही साबित कर देता हूं।


फोर्ड को भारी पड़ गया एक बयान

1999 में टाटा समूह की यात्री कार टाटा इंडिका से अपेक्षित लाभ न मिलने पर इसे बेचने का फैसला ले लिया

गया था। फोर्ड मोटर से डील लगभग फाइनल हो गई थी। अमेरिका में रतन टाटा की मुलाकात फोर्ड मोटर्स के

चेयरमैन बिल फोर्ड से हुई थी। इसके बाद एक साक्षात्कार में फोर्ड ने कह दिया कि यह सौदा कर वे टाटा कंपनी

पर एहसान ही कर रहे हैं। यह बात रतन टाटा के दिल पर लग गई। वे इस बात को भलीभांति जानते थे



किअगर एक बार अपमान सह लिया तो भविष्य में वह पराक्रम के कितने ही पर्वत क्यों न खड़े कर दें, किंतु

उनका मूल्य शून्य ही रहेगा। उन्होंने तत्काल डील रद कर दी। बाद में जब फोर्ड की हालत खराब हुई तो उसी

टाटा मोटर्स ने ही उससे 2008 में जगुआर और लैंडरोवर को टेकओवर कर लिया।
नई पीढ़ी के साथ कदमताल

1991 से 2012 तक वे टाटा समूह के अध्यक्ष रहे और उन्होंने इसको दुनिया के 120 से ज्यादा देशों में पहुंचा

दिया। इस अवधि में 42 अरब रुपये का समूह उनके नेतृत्व में 84 खरब रुपये का हो गया। 86 वर्ष की उम्र में

भी रतन टाटा को जेनरेशन गैप जैसी समस्या नहीं थी। जीवन के अंतिम वर्षों में 30 वर्षीय शांतनु नायडू उनके

सहायक और मित्र थे। टीनेजर्स से बातें करने, आइडिया शेयर करने में वे कोई संकोच नहीं करते थे। शांतनु

बताते हैं, ‘2019 में हम दोनों केरल टूर पर गए थे। उन्हें सूरज की रोशनी का आनंद लेना, तैराकी करना भाता

था। यंग जेनरेशन के साथ मिलकर उन्होंने बिग बास्केट, वन एमजी, टाटा क्वीक, नियो जैसे दर्जनों नए

स्टार्टअप्स की शुरुआत की और उन्हें आगे बढ़ाया। यह काम वह अब भी कर रहे थे।’
नैनो की कहानी और टाटा का उद्देश्य

मुंबई की सड़क पर एक स्कूटर पर सवार परिवार को बारिश में भींगते देखा तो सोचा कि ऐसे परिवारों के लिए

क्या किया जा सकता है। यहीं से उनके दिमाग में दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने का आइडिया आया।

उन्होंने तय किया कि कार की कीमत एक लाख रुपये होगी। टाटा मोटर्स के लिए यह बहुत मुश्किल टास्क था।

रतन टाटा ने 18 मई, 2006 को बंगाल के हुगली जिले के सिंगुर में नैनो कार परियोजना लगाने का ऐलान

किया। इसके लिए तत्कालीन बंगाल सरकार से 1000 एकड़ जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। इस पर

राजनीति शुरू हो गई और 400 एकड़ जमीन की वापसी को ममता बनर्जी ने आंदोलन छेड़ दिया। आखिरकार

रतन टाटा ने बंगाल से अपनी परियोजना बाहर ले जाने की घोषणा कर दी। टाटा समूह को इससे बहुत नुकसान

हुआ। इसके बाद नैनो गुजरात में शुरू हुई। तमाम अवरोधों के बाद टाटा का सपना पूरा हुआ। हालांकि नैनो कार

जनता को उतनी पसंद नहीं आई। रतन टाटा स्पष्ट कहते थे, सत्ता और धन, यह दोनों मेरे प्रमुख सिद्धांत नहीं

हैं। उन्होंने जीवन पर्यंत नैतिकता और परोपकारिता को अपने व्यावसायिक हित से पहले रखा भी। सिंगुर सैटबैक के बाद भी टाटा ने कोलकाता का ध्यान रखा और वहां व रांची में कैंसर अस्पताल की शुरुआत की। ममता सरकार के निवेदन पर स्वास्थ्य व आधारभूत संरचना में भी टाटा समूह ने हमेशा मदद के हाथ आगे बढ़ाए।

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