Chikheang • The day before yesterday 13:56 • views 169
सांकेतिक तस्वीर।
जासं, आगरा। 20 मई 1993 की सुबह 11 बजे इंद्रा देवी अपने पति कैलाश चंद और चारों बच्चों के साथ नाश्ता कर रही थीं। सब एक दूसरे से बातचीत और हंसी मजाक कर रहे थे। नाश्ते के बाद परिवार के लोगाें के पानी पीने के कुछ देर बाद ही हालत बिगड़ना शुरू हो गई। मुंह से झाग निकलने लगा, उल्टियां होने लगीं।
सात वर्ष का बेटा जोगेंद्र उनकी आंखों के सामने बेहोश हो गया, इंद्रा देवी की आंखों के सामने सब कुछ हो रहा था। उनकी अपनी भी हालत बिगड़ने के चलते वह बच्चों की मदद करने में खुद को असमर्थ पा रही थीं। परिवार के सभी छह लाेगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इंद्रा देवी समेत परिवार की हालत में सुधार होने पर होश आ गया, लेकिन सात वर्ष का बेटा जोगेंद्र हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया।
खटीकपाड़ा जल त्रासदी की बात करते ही 33 वर्ष का बीता समय इंद्रा देवी की आंखों में एक लम्हे में सिमट आया था।मौत का दृश्य आंखों में तैर गया। उस मनहूस सुबह को वह कभी नहीं भूलतीं, दूषित जल ने सात वर्ष के बेटे जोगेंद्र को उनसे छीन लिया था। आंखों के सामने नाश्ता करता बेटा दूषित जल की भेंट चढ़ गया था।
इंद्रा देवी
इंद्रा देवी बताती हैं कि पूरी बस्ती में मौत की दहशत थी। लोग सांसों में जहर घुलने के डर से मुंह पर अंगौछा या रूमाल बांध कर निकल रहे थे।बेटे की मौत से उन समेत परिवार के सभी सदस्य बुरी तरह टूट चुके थे। बस्ती में शायद ही कोई ऐसा घर बचा हो जहां से रोने की आवाज न आ रही होतीं।
हमेशा एक दूसरे के सुख-दुख में खड़े होने वाले बस्ती के लोगों पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा था कि वह अपनों को ही सांत्वना देने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। सभी परिवारों का हाल एक जैसा था। किसी का बेटा चला गया था ताे किसी का पति, पिता या भाई दूषित पानी से अपनी जान गंवा चुका था।
इंद्रा देवी बताती हैं कि हद तो तब हो गई, जल त्रासदी में मरने वालों के स्वजन को अधिकारी 10 हजार रुपये मुआवजा देने के लिए बस्ती में पहुंच गए। अधिकारियों की नजरों में मरने वालों के जीवन की कीमत सिर्फ 10 हजार रुपये थी। बेटे को खो चुकी इंद्रा देवी समेत बस्ती के लोग मुआवजे की राशि देख अपना आपा खो बैठे थे। इंद्रा देवी ने मुआवजे की राशि अधिकारियों के सामने फेंक दी थी।
अधिकारियों से कहा कि इसे उन्हें देने की जगह पानी में लगाओ, टंकी साफ कराओ। जिससे लोगों को दूषित पानी पीकर उनकी तरह किसी और मां को अपना बेटा न खोना पड़े। मुआवजा देने आए अधिकारियों के पास इंद्रा देवी की बातों का कोई उत्तर नहीं था।
वह बताती हैं कि अपनों को गंवाने वाले अधिकांश लोगों की हालत उनकी जैसी थी। उस समय उनके पति कैलाश चंद, रावतपाड़ा में सब्जी की ठेल लगाते थे। वर्तमान में सिकंदरा मंडी में पति की आढ़त है। जोगेंद्र को गंवाने की पीड़ा परिवार के चेहरे पर आज भी दिखाई देती है। |
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