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पिता की आज्ञा या ममता का बलिदान? आखिर क्यों भगवान परशुराम ने अपनी ही माता का सिर काट दिया था?

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Lord Parshuram: भगवान परशुराम ने अपनी ही माता का सिर काट दिया था?



धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी को उनके अदम्य साहस, न्यायप्रियता और भयंकर क्रोध के लिए जाना जाता है। लेकिन उनके (Lord Parshuram) जीवन की सबसे चौंकाने वाली घटना उनकी अपनी माता माता रेणुका का सिर काटना था। यह सुनकर किसी का भी दिल कांप सकता है कि एक पुत्र अपनी मां का सिर कैसे काट सकता है?

लेकिन इस पौराणिक घटना के पीछे केवल क्रोध नहीं, बल्कि पिता के प्रति समर्पण और कर्तव्य की कठिन परीक्षा थी। आइए जानते हैं इस रहस्यमयी कहानी का पूरा सच।

  

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महर्षि जमदग्नि का क्रोध

पद्म पुराण के \“सृष्टि खंड\“ में इस कथा के बारे में बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान परशुराम (Parshuram Beheads Mother) के पिता महर्षि जमदग्नि एक महान तपस्वी थे और उनकी माता रेणुका बहुत बड़ी पतिव्रता थीं। एक बार माता रेणुका नदी किनारे जल लेने गईं। वहां उन्होंने गंधर्व राज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करते देखा। उन्हें देखते हुए माता रेणुका के मन में कुछ पल के लिए विचलित भाव आ गया और वे उसी विचार में खो गईं।

इस वजह से उन्हें आश्रम लौटने में देरी हो गई। जब वे वापस पहुंचीं, तो महर्षि जमदग्नि ने अपनी योगशक्ति से जान लिया कि उनकी पत्नी के मन में मानसिक चंचलता आई थी। तपोबल के कारण वे इसे मर्यादा का उल्लंघन मान बैठे और बहुत ज्यादा क्रोधित हो गए।
पिता की आज्ञा

क्रोध में आकर महर्षि जमदग्नि ने अपने बड़े पुत्रों को आदेश दिया कि वे अपनी माता का वध कर दें। लेकिन ममता और धर्म के संकट में फंसे भाइयों ने अपनी मां पर हाथ उठाने से साफ इनकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर महर्षि ने अपने उन पुत्रों को भी पत्थर के समान होने का श्राप दे दिया।

अंत में, उन्होंने अपने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को बुलाया और कहा - “पुत्र! अपनी माता और इन भाइयों का वध कर दो।“
परशुराम जी का कठिन निर्णय

परशुराम जी के सामने एक तरफ \“मातृ-हत्या\“ का महापाप था और दूसरी तरफ \“पिता की आज्ञा\“। परशुराम जी अपने पिता की तपोशक्ति और उनके क्रोध को भी अच्छे से जानते थे। उन्होंने सोचा कि अगर वे आज्ञा नहीं मानेंगे, तो पिता उन्हें भी श्राप दे देंगे और माता भी जीवित नहीं रहेंगी।

लेकिन अगर वे आज्ञा मान लेते हैं, तो पिता प्रसन्न होंगे और वे उनसे वरदान स्वरूप अपनी माता को दोबारा से मांग सकेंगे। सभी बातों पर विचार करते हुए उन्होंने भारी मन से अपने परशु से अपनी माता और भाइयों का सिर काट दिया।
फिर मिला ये वरदान

पुत्र की अटूट पितृ-भक्ति देखकर महर्षि जमदग्नि बहुत खुश हुए। उन्होंने परशुराम से कहा - “पुत्र, मैं तुम पर प्रसन्न हूं, तुम कोई भी तीन वरदान मांग लो।\“\“
परशुराम जी ने बड़ी चतुराई और भक्ति से ये वरदान मांगे

  • मेरी माता को फिर से जीवित कर दें।
  • मेरे भाइयों की चेतना वापस आ जाए।
  • उन्हें अपनी मृत्यु की घटना का याद न रहे, ताकि वे मानसिक दुख से बच सकें।


महर्षि ने \“तथास्तु\“ कहा और माता रेणुका व उनके भाई फिर से जीवित हो उठे। इस तरह परशुराम जी ने अपने पिता की आज्ञा भी रखी और अपनी माता को भी वापस पा लिया।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
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