एआई से बनाई गई तस्वीर।
जागरण संवाददाता, रायबरेली। बीमा कंपनी को उपभोक्ता फोरम का आदेश न मानना महंगा पड़ गया। आदेश के खिलाफ राज्य उपभोक्ता आयोग में दायर मुकदमा खारिज हो गया। इसके चलते कंपनी को 33 साल का जुर्माना भरना पड़ा। कंपनी ने वादी को 40500 रुपये की बजाय छह लाख 46 हजार का भुगतान किया। उपभोक्ता फोरम ने रिकवरी के मुकदमे में कंपनी से वादी को भुगतान दिलाया।
यह है पूरा मामला
शहर के कैपरगंज निवासी महमूद हसन ने 1991 में उपभोक्ता फोरम में दावा दायर किया। उन्होंने बताया कि उनकी दुकान का 40 हजार रुपये का बीमा था। इसी दौरान दुकान में 19500 रुपये नकदी सहित 75 हजार की घड़ियां चोरी हो गई। केस दर्ज होने के बाद उन्होंने सभी जानकारी बीमा कंपनी को दी। सर्वेयर ने मामले की जांच कर रिपोर्ट बीमा कंपनी को सौंपी।
कंपनी ने ग्राहक को 10 हजार छह सौ 79 रुपये का भुगतान किया। वादी ने क्लेम के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में 1991 में वाद दायर किया। उपभोक्ता फोरम ने वादी के अधिवक्ता केपी वर्मा की बहस सुनने के बाद बीमा कंपनी को 60 दिन में 40500 रुपये देने का आदेश दिया।
कोर्ट ने कहा कि समयावधि में भुगतान न करने पर 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना देना होगा। 60 दिन बीतने के बाद भी भुगतान न होने पर वादी के अधिवक्ता ने रिकवरी का मुकदमा उपभोक्ता फोरम में दायर किया।
बीमा कंपनी ने उपभोक्ता फोरम के आदेश के खिलाफ राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील की। इस दौरान उपभोक्ता फोरम में रिकवरी का मुकदमा स्थगित रहा। उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी की सुनवाई के बाद वर्ष 2023 मुकदमा खारिज कर दिया।
दोबारा उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष मदन लाल निगम, सदस्य सुनीता मिश्र, सदस्य प्रतिमा सिंह ने रिकवरी के मुकदमे की सुनवाई की। उन्होंने आदेश दिया कि बीमा कंपनी 33 साल का 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से वादी को भुगतान करे। इसके तहत ग्राहक को बीमा कंपनी ने 40500 रुपये के बजाय छह लाख रुपये दिए। |
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