Shani dev and Raja Dashrath story (AI Generated Image)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। माना जाता है कि कुंडली में शनि दोष होने पर व्यक्त को जीवन में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कथाओं में यह वर्णन मिलता है कि एक बार इस तरह की स्थिति का सामना अयोध्या के राजा दशरथ को भी करना पड़ा था। चलिए जानते हैं कि आखिर किस प्रकार राजा दशरथ को शनि देव के प्रभाव से मुक्ति पाई।
यह है पौराणिक कथा
पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, राजा दशरथ के राज में अयोध्या की प्रजा सुखी जीवन-यापन कर रही थी। एक दिन ज्योतिषियों ने राजा को बताया कि शनि कृत्तिका नक्षत्र के अन्तिम चरण में हैं और रोहिणी नक्षत्र का भेदन करने जा रहे हैं, जिसे ‘रोहिणी-शकट-भेदन’भी कहा जाता है। ज्योतिषियों ने राजा को बताया कि शनि का रोहणी में जाना देवता और असुर दोनों के लिए ही कष्टकारी और भयप्रद है।
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इसके प्रभाव से 12 वर्ष तक अत्यंत दुखदायी और अकाल झेलना पड़ता है। यह बात जानने के बाद राजा दशरथ काफी परेशान हो गए और वशिष्ठ ऋषि और अन्य ज्ञानी पंडितों से इसका समाधान पूझा। ऋषि वशिष्ठ ने बताया कि इसका कोई हल नहीं है, क्योंकि शनि के रोहिणी नक्षत्र में भेदन होने पर इस योग के दुष्प्रभाव से तो स्वयं ब्रह्मा या इन्द्र देव भी रक्षा नहीं कर सकते।
शनि देव से युद्ध करने पहुंचे राजा
यह सब जानने के बाद जब राजा को कोई रास्ता समझ नहीं आया, तो वह अपने दिव्यास्त्र लेकर नक्षत्र मंडल में शनि देव से युद्ध करने पहुंच गए। राजा का यह साहस देखकर शनि देव प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। तब राजा दशरथ ने शनिदेव से कहा कि जब तक सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी का अस्तित्व है, तब तक आप रोहिणी नक्षत्र का भेदन न करें। शनि देव ने राजा को ऐसा ही वचन दिया।
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साथ ही शनि देव ने राजा को आश्वस्त किया कि 12 वर्षों तक उनके राज्य में कोई भी अकाल नहीं पड़ेगा और उनकी यश-कीर्ति तीनों लोकों में फैलेगी। तब राजा दशरथ ने शनि स्त्रोत का गान किया और उनकी स्तुति की।
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